बूंदी के चौहानों का इतिहास वीरता, बलिदान और कलात्मकता का अद्भुत संगम है। यहाँ के शासक ‘हाड़ा चौहान’ कहलाते हैं, जो नाडोल के चौहानों की ही एक शाखा हैं। हाड़ौती क्षेत्र (कोटा, बूंदी, झालावाड़ और बारां) का नाम इन्हीं ‘हाड़ा’ शासकों के कारण पड़ा।
यहाँ बूंदी के हाड़ा चौहानों का विस्तृत सामान्य परिचय दिया गया है:
1. स्थापना और संस्थापक (Establishment)
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संस्थापक: राव देवा (देवीसिंह) हाड़ा।
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समय: 1242 ई. (13वीं शताब्दी)।
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पृष्ठभूमि: राव देवा ने इस क्षेत्र के स्थानीय मीणा शासकों (जेता मीणा) को पराजित कर ‘बूंदा घाटी’ पर अधिकार किया और ‘बूंदी’ राज्य की नींव रखी। इसका नाम ‘बूंदा मीणा’ के नाम पर ही ‘बूंदी’ पड़ा।
2. हाड़ा वंश की उत्पत्ति (Origin of Hadas)
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हाड़ा चौहानों का निकास नाडोल (पाली) के चौहान वंश से माना जाता है।
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जनश्रुति के अनुसार, अस्थिपाल (अस्थिदेव) के नाम से ‘हाड़ा’ शब्द की उत्पत्ति हुई, जो नाडोल के शासक लक्ष्मण चौहान के वंशज थे।
3. बूंदी के प्रमुख प्रतापी शासक (Major Rulers)
| शासक | मुख्य योगदान / घटना |
| राव देवा | बूंदी राज्य के संस्थापक। |
| राव बरसिंह | तारागढ़ दुर्ग (बूंदी) का निर्माण करवाया (1354 ई.)। |
| राव सुरजन हाड़ा | मुग़ल सम्राट अकबर की अधीनता स्वीकार की (रणथंभौर की संधि, 1569)। वे अपनी वीरता और कूटनीति के लिए प्रसिद्ध थे। |
| राव रतन सिंह | जहांगीर के विश्वसनीय सेनापति। इन्हें ‘सरबुलंद राय’ की उपाधि मिली थी। |
| राव राजा अनिरुद्ध सिंह | इन्होंने ‘चौरासी खंभों की छतरी’ का निर्माण करवाया। |
| महाराव बुद्धसिंह | इनके समय बूंदी में उत्तराधिकार का संघर्ष शुरू हुआ, जिसमें राजस्थान में पहली बार मराठों का हस्तक्षेप हुआ। |
4. स्थापत्य और कला (Art & Architecture)
बूंदी अपनी विशिष्ट चित्रकला और बावलियों के लिए विश्व प्रसिद्ध है:
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तारागढ़ दुर्ग: इसे ‘तिलिस्मी किला’ भी कहा जाता है। यहाँ की ‘गर्भ गुंजन’ तोप बहुत प्रसिद्ध है।
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बूंदी चित्रकला शैली: इसमें पशु-पक्षियों (विशेषकर नाचते हुए मोर) और प्राकृतिक दृश्यों का सुंदर चित्रण मिलता है। ‘चित्रशाला’ इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण है।
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बावलियों का शहर: बूंदी को ‘Stepwells of Rajasthan’ कहा जाता है। यहाँ की ‘रानीजी की बावड़ी’ स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना है।
5. ऐतिहासिक महत्व और रोचक तथ्य
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कोटा का उदय: पहले कोटा भी बूंदी का ही हिस्सा था। 1631 ई. में मुग़ल सम्राट शाहजहाँ ने राव रतन सिंह के पुत्र माधोसिंह को कोटा की स्वतंत्र सत्ता सौंप दी, जिससे कोटा एक अलग रियासत बना।
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84 खंभों की छतरी: यह बूंदी के वैभवशाली इतिहास की प्रतीक है।
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स्वतंत्रता प्रेमी: मुगलों से संधि के बावजूद, हाड़ा चौहानों ने अपनी सांस्कृतिक पहचान और आन-बान को हमेशा सर्वोपरि रखा।
बूंदी के चौहान – एक नजर में (Table)
| श्रेणी | विवरण |
| वंश | हाड़ा चौहान (सूर्यवंशी)। |
| राजधानी | बूंदी। |
| कुलदेवी | श्री आशापुरा माता। |
| प्रसिद्ध दुर्ग | तारागढ़ (बूंदी)। |
| उपनाम | छोटी काशी, बावलियों का शहर। |
निष्कर्ष:
बूंदी के चौहानों ने न केवल युद्ध के मैदान में अपनी तलवार का जौहर दिखाया, बल्कि स्थापत्य और चित्रकला के माध्यम से राजस्थान की संस्कृति को समृद्ध किया। आज भी बूंदी का किला और यहाँ की गलियाँ हाड़ा राजाओं के गौरवशाली इतिहास की गवाही देती हैं।
बूंदी के हाड़ा चौहानों का इतिहास राव देवा से शुरू होकर भारतीय स्वतंत्रता तक निरंतर बना रहा। इस राजवंश ने न केवल मुगलों के समय महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, बल्कि अपनी कला और स्थापत्य के लिए भी पहचाने गए।
यहाँ बूंदी के प्रमुख हाड़ा शासकों की क्रमबद्ध सूची और उनके शासनकाल की मुख्य उपलब्धियाँ दी गई हैं:
बूंदी के हाड़ा चौहानों की वंशावली
| क्रम | राजा का नाम | शासन काल (लगभग) | मुख्य विशेषताएँ / ऐतिहासिक घटनाएँ |
| 1 | राव देवा (देवीसिंह) | 1242 ई. से | संस्थापक। मीणा शासकों को हराकर बूंदी राज्य की नींव रखी। |
| 2 | राव बरसिंह | 1343 – 1372 ई. | 1354 ई. में प्रसिद्ध तारागढ़ दुर्ग (बूंदी) का निर्माण करवाया। |
| 3 | राव हम्मीर | 1384 – 1400 ई. | मेवाड़ के साथ सीमा विस्तार को लेकर संघर्ष। |
| 4 | राव सुल्तान | 1531 – 1554 ई. | हुमायूँ के समकालीन। राज्य में आंतरिक स्थिरता लाने का प्रयास किया। |
| 5 | राव सुरजन हाड़ा | 1554 – 1585 ई. | अत्यंत महत्वपूर्ण शासक। 1569 में अकबर के साथ रणथंभौर की संधि की और मुग़ल मनसबदार बने। |
| 6 | राव भोज | 1585 – 1607 ई. | सुरजन हाड़ा के पुत्र। अकबर के अभियानों में सक्रिय भूमिका निभाई। |
| 7 | राव रतन सिंह | 1607 – 1631 ई. | जहांगीर के चहेते। इन्हें ‘सरबुलंद राय’ और ‘रामराज’ की उपाधियाँ मिलीं। इनके समय ही कोटा अलग राज्य बना। |
| 8 | राव राजा शत्रुशाल | 1631 – 1658 ई. | शाहजहाँ के वफादार। सामूगढ़ के युद्ध में मुग़ल उत्तराधिकार संघर्ष में वीरगति को प्राप्त हुए। |
| 9 | राव भावसिंह | 1658 – 1681 ई. | औरंगज़ेब के समय के शासक। कला और साहित्य के महान संरक्षक। |
| 10 | राव अनिरुद्ध सिंह | 1681 – 1695 ई. | इन्होंने औरंगज़ेब के दक्षिण अभियानों में भाग लिया। 84 खंभों की छतरी इन्हीं की याद में बनी। |
| 11 | राव राजा बुद्धसिंह | 1695 – 1739 ई. | इनके समय बूंदी में उत्तराधिकार युद्ध हुआ, जिससे मराठों का राजस्थान में प्रथम प्रवेश हुआ। |
| 12 | राव राजा उम्मेद सिंह | 1748 – 1770 ई. | बूंदी चित्रकला का ‘स्वर्ण काल’। उन्होंने अंत में राजपाठ त्याग कर सन्यास ले लिया था। |
| 13 | महाराव विष्णूसिंह | 1773 – 1821 ई. | 1818 ई. में अंग्रेजों (ईस्ट इंडिया कंपनी) से संधि की। |
| 14 | महाराव रामसिंह | 1821 – 1889 ई. | आधुनिक बूंदी के निर्माता। प्रसिद्ध इतिहासकार सूर्यमल मिश्रण इन्हीं के दरबारी कवि थे। |
| 15 | महाराव बहादुर सिंह | 1945 – 1947 ई. | बूंदी के अंतिम शासक। इनके समय बूंदी का राजस्थान संघ में विलय हुआ। |
प्रमुख गौरवशाली बिंदु
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कोटा का विभाजन (1631 ई.): राव रतन सिंह के समय उनके पुत्र माधोसिंह को कोटा की स्वतंत्र रियासत मिल गई, जो पहले बूंदी का ही भाग था।
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साहित्यिक योगदान: महाकवि सूर्यमल मिश्रण ने महाराव रामसिंह के संरक्षण में ‘वंश भास्कर’ की रचना की, जो चौहानों का सबसे बड़ा पिंगल काव्य ग्रंथ है।
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चित्रकला: राव उम्मेद सिंह के समय बूंदी शैली अपनी पराकाष्ठा पर थी, जिसे आज भी ‘चित्रशाला’ के रूप में तारागढ़ दुर्ग में देखा जा सकता है।
क्या आप इनमें से किसी विशेष राजा, जैसे राव सुरजन हाड़ा की अकबर से संधि, या राव उम्मेद सिंह के चित्रकला प्रेम के बारे में विस्तार से जानना चाहेंगे?