राव रणमल

मारवाड़ के इतिहास में राव रणमल (शासनकाल: 1427–1438 ई.) एक अत्यंत प्रभावशाली, विशालकाय शरीर के धनी और कूटनीतिज्ञ शासक थे। उनका जीवन मारवाड़ और मेवाड़ दोनों रियासतों के इतिहास को जोड़ने वाली सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है।

यहाँ राव रणमल का विस्तृत और सूक्ष्म विवरण दिया गया है:


1. प्रारंभिक संघर्ष और मेवाड़ गमन

  • अधिकारों का हनन: राव चूड़ा ने अपने छोटे पुत्र ‘कान्हा’ को उत्तराधिकारी बना दिया था, जिससे नाराज होकर ज्येष्ठ पुत्र रणमल मेवाड़ के महाराणा लाखा की शरण में चले गए।

  • हंसाबाई का विवाह: रणमल ने अपनी बहन हंसाबाई का विवाह मेवाड़ के वृद्ध महाराणा लाखा से इस शर्त पर करवाया कि हंसाबाई का पुत्र ही मेवाड़ का अगला उत्तराधिकारी होगा। इसी कारण कुँवर चूड़ा (मेवाड़ के भीष्म पितामह) ने गद्दी का त्याग किया।

2. मारवाड़ की सत्ता प्राप्ति (1427 ई.)

  • राव कान्हा की मृत्यु के बाद मारवाड़ में अस्थिरता फैल गई। रणमल ने मेवाड़ की सेना की सहायता से मंडोर पर आक्रमण किया और अपने पैतृक राज्य पर अधिकार कर लिया।

3. मेवाड़ की राजनीति में वर्चस्व

महाराणा लाखा की मृत्यु के बाद उनका पुत्र मोकल शासक बना। मोकल छोटा था, इसलिए रणमल मेवाड़ के ‘संरक्षक’ (Regent) बन गए।

  • प्रभाव: रणमल ने मेवाड़ के ऊँचे पदों पर मारवाड़ के राठौड़ों को नियुक्त करना शुरू कर दिया, जिससे मेवाड़ के पुराने सामंत (सिसोदिया) उनसे चिढ़ने लगे।

  • मोकल की हत्या: जब चाचा और मेरा ने महाराणा मोकल की हत्या कर दी, तो रणमल ने ही उन हत्यारों को मारकर मेवाड़ की व्यवस्था संभाली और छोटे महाराणा कुंभा के संरक्षक बने।

4. प्रमुख विजय और युद्ध

रणमल एक महान योद्धा थे। उन्होंने अपने और मेवाड़ के शत्रुओं का दमन किया:

  • बूंदी और सिरोही विजय: उन्होंने इन राज्यों को दबाकर मेवाड़ और मारवाड़ की धाक जमाई।

  • चाचा-मेरा का दमन: महाराणा मोकल के हत्यारों का पीछा करके उन्हें मौत के घाट उतारा।

5. रणमल की हत्या और अंत (1438 ई.)

मेवाड़ के सामंतों को डर था कि रणमल मेवाड़ पर पूरी तरह कब्जा कर लेंगे। इसलिए उन्होंने एक षड्यंत्र रचा:

  • भारमली का सहयोग: रणमल ‘भारमली’ नामक एक दासी से प्रेम करते थे। मेवाड़ के सामंतों ने भारमली को अपनी ओर मिला लिया।

  • हत्या का दृश्य: एक रात जब रणमल अत्यधिक मदिरा के नशे में थे, भारमली ने उन्हें उनकी ही पगड़ी से चारपाई पर बांध दिया। इसके बाद सिसोदिया सरदारों ने उन पर हमला कर दिया। रणमल ने बंधे हुए होने के बावजूद वीरता से मुकाबला किया, लेकिन अंततः वे मारे गए।

6. मारवाड़ पर संकट

रणमल की हत्या के बाद मेवाड़ की सेना ने मंडोर पर अधिकार करने के लिए धावा बोल दिया। रणमल के पुत्र राव जोधा उस समय चित्तौड़ में ही थे, जिन्हें एक नगाड़े वाले ने चेतावनी दी थी:

“जोधा भाग सके तो भाग, थारो रणमल मार्यो गयो!”

7. सूक्ष्म विवरण और सांस्कृतिक प्रभाव

  • व्यक्तित्व: रणमल के बारे में कहा जाता है कि वे असाधारण रूप से लंबे और शक्तिशाली थे। उनकी तलवार और कवच का वजन सामान्य योद्धाओं से कहीं अधिक था।

  • राठौड़-सिसोदिया वैमनस्य: उनकी मृत्यु के बाद मारवाड़ और मेवाड़ के बीच दुश्मनी कई वर्षों तक चली, जिसे बाद में ‘आंवल-बांवल की संधि’ के जरिए सुलझाया गया।


MS Word वंशावली चार्ट के लिए प्रविष्टि:

  • नाम: राव रणमल (Rao Ranmal)

  • शासन: 1427–1438

  • विशेष: मेवाड़ के संरक्षक रहे, मारवाड़-मेवाड़ संबंधों के सूत्रधार। इनके बाद इनके वीर पुत्र राव जोधा का काल शुरू होता है जिन्होंने जोधपुर बसाया।

अगला शासक: क्या हम राव जोधा (जोधपुर के संस्थापक) के बारे में विस्तार से चर्चा करें? उन्होंने ही मारवाड़ को एक नई पहचान दी थी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *