राव धूहड़

राव अस्थान की मृत्यु के बाद उनके ज्येष्ठ पुत्र राव धूहड़ मारवाड़ की गद्दी पर बैठे। इनका शासनकाल ऐतिहासिक दृष्टि से कम, लेकिन सांस्कृतिक और धार्मिक दृष्टि से मारवाड़ के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है।

यहाँ राव धूहड़ का विस्तृत इतिहास दिया गया है:


1. परिचय और शासनकाल

  • शासन काल: 1292 ईस्वी – 1309 ईस्वी (लगभग)।

  • वंश: राठौड़ (राव अस्थान के पुत्र)।

  • राजधानी: इनका मुख्य केंद्र खेड़ (बाड़मेर) ही रहा।


2. सबसे महत्वपूर्ण कार्य: नागणेची माता की स्थापना

राव धूहड़ के नाम के साथ जो सबसे बड़ी उपलब्धि जुड़ी है, वह है राठौड़ वंश की कुलदेवी की स्थापना।

  • कर्नाटक यात्रा: ऐसा माना जाता है कि राव धूहड़ अपने गुरु या किसी सिद्ध पुरुष के कहने पर कर्नाटक (दक्षिण भारत) गए थे।

  • कुलदेवी की मूर्ति: वहां से वे राठौड़ वंश की कुलदेवी चक्रेश्वरी माता की मूर्ति लेकर आए।

  • नागाणा गाँव (बाड़मेर): उन्होंने बाड़मेर के ‘नागाणा’ गाँव में इस मूर्ति की स्थापना की। नागाणा गाँव में स्थापित होने के कारण ही देवी का नाम ‘नागणेची माता’ पड़ा।

  • विशेषता: नागणेची माता की मूल मूर्ति लकड़ी (नीम की लकड़ी) की बनी हुई है और देवी के 18 हाथ हैं। तभी से राठौड़ वंश में नीम के पेड़ को पवित्र माना जाने लगा।


3. सैन्य अभियान और संघर्ष

राव धूहड़ का जीवन भी युद्धों से अछूता नहीं रहा:

  • मंडोर पर आक्रमण: उन्होंने मंडोर (जो उस समय प्रतिहारों/परिहारों के पास था) को जीतने का प्रयास किया था, लेकिन वे पूर्णतः सफल नहीं हो पाए।

  • पड़ोसी राज्यों से संघर्ष: उन्होंने जैसलमेर के भाटियों और आस-पास के पंवार राजपूतों के साथ कई छोटी-बड़ी लड़ाइयाँ लड़ीं ताकि खेड़ की सीमाओं को सुरक्षित रखा जा सके।


4. वीरगति (1309 ईस्वी)

राव धूहड़ की मृत्यु एक युद्ध के दौरान हुई थी:

  • तिवनपाल भाटी से संघर्ष: जैसलमेर के भाटी शासकों के साथ हुए एक भीषण युद्ध में राव धूहड़ वीरतापूर्वक लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।

  • उनकी मृत्यु के बाद मारवाड़ की स्थिति थोड़ी अस्थिर हो गई थी, जिसे बाद में उनके वंशजों ने संभाला।


5. दरबार और सूक्ष्म विवरण

  • धार्मिक झुकाव: राव धूहड़ के काल में ही राठौड़ वंश में तांत्रिक और शक्ति पूजा का प्रभाव बढ़ा।

  • कुल चिह्न: नागणेची माता के साथ-साथ ‘बाज’ (पक्षी) को भी राठौड़ वंश का शुभ प्रतीक माना जाने लगा, क्योंकि ऐसी मान्यता है कि माता बाज के रूप में प्रकट हुई थीं।


वंशावली चार्ट के लिए नोट (MS Word के लिए):

जब आप अपना चार्ट बना रहे हों, तो राव धूहड़ के नीचे उनके पुत्र राव रायपाल का नाम लिखें। राव धूहड़ का सबसे बड़ा योगदान यह है कि उन्होंने बिखरे हुए राठौड़ कबीलों को एक ‘साझा धार्मिक पहचान’ (नागणेची माता के रूप में) दी, जिसने आगे चलकर राठौड़ साम्राज्य को एकजुट करने में बड़ी भूमिका निभाई।

अगला शासक: इनके बाद राव रायपाल गद्दी पर बैठे, जिन्होंने अपनी कूटनीति से साम्राज्य को और अधिक विस्तार दिया। क्या आप उनके बारे में जानना चाहेंगे?

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