राव सीहा की मृत्यु के बाद उनके पुत्र राव अस्थान मारवाड़ के राठौड़ वंश के दूसरे महत्वपूर्ण शासक बने। उन्होंने न केवल अपने पिता के छोड़े हुए राज्य को संभाला, बल्कि राठौड़ों के साम्राज्य विस्तार की असली नींव भी रखी।
यहाँ राव अस्थान के बारे में विस्तृत विवरण दिया गया है:
1. परिचय और राज्यारोहण
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शासन काल: 1273 ईस्वी – 1292 ईस्वी।
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वंश: राठौड़ (राव सीहा के पुत्र)।
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राजधानी: शुरुआत में पाली के आस-पास का क्षेत्र, बाद में उन्होंने खेड़ (बाड़मेर) को अपनी शक्ति का केंद्र बनाया।
2. प्रमुख विजय और साम्राज्य विस्तार
राव अस्थान एक बहुत ही कूटनीतिक और वीर योद्धा थे। उन्होंने मारवाड़ में राठौड़ों के प्रभाव को बढ़ाने के लिए दो बड़े कदम उठाए:
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खेड़ की विजय (बाड़मेर): उस समय ‘खेड़’ पर गुहिल वंश के शासकों का अधिकार था। राव अस्थान ने गुहिलों को पराजित कर खेड़ पर कब्जा कर लिया। यह राठौड़ों के लिए एक बड़ी उपलब्धि थी क्योंकि खेड़ एक सुरक्षित और रणनीतिक स्थान था।
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ईडर विजय (गुजरात सीमा): राव अस्थान ने अपने भाइयों को अलग-अलग दिशाओं में विस्तार के लिए भेजा। उनके भाई सोनग ने ईडर (गुजरात) में राठौड़ वंश की स्थापना की।
3. प्रमुख युद्ध और बलिदान
राव अस्थान का सबसे प्रमुख और अंतिम संघर्ष दिल्ली के सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी की सेना के साथ हुआ:
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मुगल/तुर्क संघर्ष: जलालुद्दीन खिलजी ने जब राजपूताना पर आक्रमण किया, तो उसका सामना राव अस्थान से हुआ।
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वीरगति: 1292 ईस्वी में पाली के पास एक भीषण युद्ध हुआ। राव अस्थान वीरतापूर्वक लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। उनके साथ उनके कई भाई और सैकड़ों योद्धा भी शहीद हुए थे।
4. धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व
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ब्राह्मणों के रक्षक: अपने पिता की तरह, अस्थान ने भी पालीवाल ब्राह्मणों की रक्षा का दायित्व निभाया।
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धार्मिक मान्यता: राव अस्थान को मारवाड़ के इतिहास में एक धर्मनिष्ठ राजा माना जाता है जिसने शरणागत की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी।
5. परिवार और वंश वृद्धि
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राव अस्थान के कई पुत्र थे, जिन्होंने आगे चलकर मारवाड़ की अलग-अलग शाखाओं को जन्म दिया।
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उनके बाद उनके पुत्र राव धूहड़ गद्दी पर बैठे, जो कर्नाटक से राठौड़ों की कुलदेवी नागणेची माता की मूर्ति लेकर आए थे।
महत्वपूर्ण सूक्ष्म जानकारी (Professional Note):
यदि आप इसे अपनी हिस्ट्री नोट्स या वेबसाइट के लिए लिख रहे हैं, तो यह ध्यान रखें कि राव अस्थान ने ही राठौड़ों को ‘पाली’ के एक छोटे से कस्बे से निकालकर ‘खेड़’ जैसे विस्तृत क्षेत्र तक पहुँचाया। उनके समय से ही राठौड़ों ने स्थानीय जनजातियों (जैसे मेर और मीणा) के साथ तालमेल बिठाकर एक स्थायी प्रशासनिक ढांचा तैयार करना शुरू किया था।