राव देवा (देवीसिंह) हाड़ा, बूंदी के हाड़ा राजवंश के संस्थापक और प्रथम प्रतापी शासक थे। उन्होंने 13वीं शताब्दी में मेवाड़ और मालवा के बीच स्थित ‘हाड़ौती’ क्षेत्र में चौहानों की सत्ता को पुनर्जीवित किया।
यहाँ राव देवा के बारे में विस्तृत ऐतिहासिक विवरण दिया गया है:
1. पारिवारिक पृष्ठभूमि (Family & Heritage)
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वंश: हाड़ा चौहान (नाडोल के चौहानों की एक शाखा)।
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पूर्वज: वे नाडोल के राव लक्ष्मण चौहान के वंशज थे। उनके पिता का नाम राव बंगदेव था।
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उपाधि: ‘हाड़ा’ शब्द की उत्पत्ति इनके पूर्वज ‘अस्थिपाल’ (हाड़ौती के जनमानस में ‘हाड़ा’ के नाम से प्रसिद्ध) के नाम से हुई मानी जाती है।
2. युद्ध और विजय (Wars & Conquests)
राव देवा का सबसे बड़ा योगदान स्थानीय शक्तियों को पराजित कर एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना करना था:
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मीणाओं पर विजय (1242 ई.): उस समय बूंदी की घाटी पर मीणाओं का शासन था। राव देवा ने जेता मीणा को एक रणनीतिक युद्ध (जिसे ‘बूंदा की घाटी का युद्ध’ भी कहा जाता है) में पराजित किया।
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बूंदी की स्थापना: इस विजय के बाद उन्होंने 1242 ई. में ‘बूंदी’ (नामकरण: बूंदा मीणा के नाम पर) को अपनी राजधानी बनाया।
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सीमा विस्तार: उन्होंने खटाखट और आसपास के अन्य क्षेत्रों को जीतकर हाड़ौती के एक बड़े भूभाग पर अपना प्रभाव स्थापित किया।
3. निर्माण कार्य (Construction)
राव देवा का शासनकाल मुख्य रूप से राज्य की स्थापना और सुरक्षा पर केंद्रित था:
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बूंदी शहर की नींव: उन्होंने वर्तमान बूंदी शहर के शुरुआती ढांचे और सुरक्षा प्राचीरों का निर्माण करवाया।
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धार्मिक स्थल: वे अपनी कुलदेवी आशापुरा माता के अनन्य भक्त थे। उन्होंने अपनी नई राजधानी में माता के पूजन और थान (मंदिर) की व्यवस्था की।
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जल प्रबंधन: उन्होंने पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण पानी के संग्रहण के लिए शुरुआती तालाबों और कुओं का निर्माण शुरू करवाया, जो आगे चलकर बूंदी की ‘बावली संस्कृति’ का आधार बना।
4. दरबार, लेखक और कवि (Court & Literature)
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चारण साहित्य: राव देवा के दरबार में चारण और भाट कवियों को विशेष स्थान प्राप्त था। उनकी वीरता और ‘हाड़ा’ वंश की उत्पत्ति के बारे में सर्वाधिक वर्णन इन्हीं कवियों की रचनाओं में मिलता है।
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लोक गाथाएँ: हाड़ौती के लोकगीतों में राव देवा को एक ‘मर्यादित पुरुष’ और ‘रक्षक’ के रूप में चित्रित किया गया है।
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प्रसिद्ध ग्रंथ: हालांकि उनके काल के समकालीन लिखित ग्रंथ कम मिलते हैं, लेकिन बाद के दरबारी कवियों (जैसे सूर्यमल मिश्रण) ने राव देवा के पराक्रम को आधार बनाकर ‘वंश भास्कर’ में विस्तृत वर्णन किया है।
5. ऐतिहासिक स्रोत (Sources)
राव देवा के इतिहास की जानकारी के मुख्य स्रोत निम्नलिखित हैं:
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वंश भास्कर: महाकवि सूर्यमल मिश्रण द्वारा रचित यह ग्रंथ राव देवा के शासन और हाड़ा वंश के निकास का सबसे प्रामाणिक विवरण देता है।
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मुँहणोत नैणसी री ख्यात: नैणसी ने राव देवा द्वारा मीणाओं को पराजित करने और बूंदी बसाने की घटना का उल्लेख किया है।
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कर्नल जेम्स टॉड (Annals of Rajasthan): टॉड ने भी अपनी पुस्तक में ‘देवा’ को एक साहसी राजकुमार बताया है जिसने हाड़ौती में एक नए युग की शुरुआत की।
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स्थानीय शिलालेख: बूंदी के आसपास के प्राचीन मंदिरों और बावड़ियों में उत्कीर्ण लेख उनकी वंशावली की पुष्टि करते हैं।
राव देवा – मुख्य तथ्य (Table)
| श्रेणी | विवरण |
| स्थापना वर्ष | 1242 ई. |
| राजधानी | बूंदी (पूर्व में बूँदा की घाटी)। |
| मुख्य प्रतिद्वंद्वी | जेता मीणा। |
| विशेषता | मेवाड़ के प्रभाव से मुक्त होकर स्वतंत्र हाड़ा राज्य की नींव रखी। |
| कुलदेवी | आशापुरा माता। |
निष्कर्ष:
राव देवा ने न केवल एक रियासत बसाई, बल्कि हाड़ा चौहानों को एक ऐसी पहचान दी जिसने आने वाली सदियों में मुगलों और मराठों के खिलाफ अपनी वीरता का लोहा मनवाया। उनके द्वारा स्थापित परंपराओं को आगे चलकर राव बरसिंह और राव सुरजन हाड़ा जैसे शासकों ने और अधिक विस्तार दिया।