राणा हम्मीर (शासनकाल: 1326–1364 ई.) मेवाड़ के इतिहास के सबसे महान पुनरुद्धारकों में से एक हैं। उन्हें ‘मेवाड़ का उद्धारक’ कहा जाता है क्योंकि उन्होंने अलाउद्दीन खिलजी की विजय के बाद खोए हुए गौरव और चित्तौड़गढ़ दुर्ग को पुनः प्राप्त किया था। उनके समय से ही मेवाड़ के शासक ‘रावल’ के स्थान पर ‘राणा’ या ‘महाराणा’ कहलाने लगे।
यहाँ राणा हम्मीर के बारे में इतिहास की एक-एक सूक्ष्म जानकारी दी गई है:
1. उत्पत्ति और पारिवारिक पृष्ठभूमि (Origin & Family)
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वंश: सिसोदिया (गुहिल वंश की ‘राहप’ वाली शाखा)।
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जन्म स्थान: सिसोदा ग्राम (इसी कारण यह शाखा ‘सिसोदिया’ कहलाई)।
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पिता: अरि सिंह (1303 के प्रथम साके में वीरगति को प्राप्त हुए थे)।
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दादा: लक्ष्मण सिंह (सिसोदा के सामंत, जो अपने 7 पुत्रों सहित चित्तौड़ की रक्षा में शहीद हुए थे)।
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उपाधियाँ: * मेवाड़ का उद्धारक: चित्तौड़ को तुर्कों से मुक्त कराने के कारण।
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विषम घाटी पंचानन: (विकट परिस्थितियों में शेर के समान) – यह उपाधि कुंभलगढ़ प्रशस्ति में दी गई है।
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वीर राजा: महाराणा कुम्भा द्वारा रचित ‘रसिक प्रिया’ (टीका) में उन्हें यह नाम दिया गया है।
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2. चित्तौड़ की पुनः प्राप्ति (1326 ई.)
1303 में चित्तौड़ के पतन के बाद वहाँ का शासन अलाउद्दीन ने मालदेव सोनगरा (जालौर का कान्हड़देव का भाई) को सौंप दिया था:
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संघर्ष: हम्मीर ने अरावली की पहाड़ियों में छिपकर छापामार युद्ध (Guerrilla Warfare) जारी रखा।
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रणनीति: उन्होंने मालदेव के पुत्र जैसा (जयसिंह) को पराजित कर 1326 ई. में चित्तौड़गढ़ पर अधिकार कर लिया।
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बरवड़ी माता का आशीर्वाद: लोक मान्यताओं के अनुसार, हम्मीर को चित्तौड़ जीतने के लिए बरवड़ी माता (अन्नपूर्णा माता) ने धन और घोड़े देकर सहायता की थी।
3. सिंगोली का युद्ध (Battle of Singoli)
हम्मीर की सबसे बड़ी सैन्य उपलब्धि दिल्ली के सुल्तान मोहम्मद बिन तुग़लक़ (MBT) को हराना थी:
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स्थान: सिंगोली (बाँसवाड़ा के पास)।
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परिणाम: हम्मीर ने सुल्तान की विशाल सेना को पराजित किया और सुल्तान को बंदी बना लिया।
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मुक्ति: कहा जाता है कि सुल्तान को 3 से 6 महीने तक चित्तौड़ में बंदी रखा गया और भारी हर्जाना (अजमेर, रणथंभौर आदि क्षेत्र) लेने के बाद ही मुक्त किया गया।
4. स्थापत्य परियोजनाएँ (Architecture)
हम्मीर का अधिकांश समय युद्धों में बीता, फिर भी उन्होंने कुछ महत्वपूर्ण निर्माण करवाए:
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अन्नपूर्णा माता का मंदिर: चित्तौड़गढ़ दुर्ग में इन्होंने अपनी ईष्ट देवी अन्नपूर्णा (बरवड़ी) माता का भव्य मंदिर बनवाया।
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चित्तौड़ का सुदृढ़ीकरण: खिलजी के आक्रमण से क्षतिग्रस्त हुए प्राचीरों और द्वारों का पुनर्निर्माण करवाया।
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सिसोदा का विकास: अपनी पैतृक जागीर सिसोदा में सैन्य चौकियों का विस्तार किया।
5. राजदरबार और व्यवस्था (Court & Administration)
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सिसोदिया सत्ता का केंद्र: उन्होंने सामंती व्यवस्था को फिर से जीवित किया और उन सरदारों को वापस बुलाया जो तुर्क शासन के दौरान बिखर गए थे।
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धार्मिक नीति: वे कट्टर शिव भक्त (एकलिंग जी के उपासक) थे, लेकिन उन्होंने चारणों और ब्राह्मणों को भारी दान देकर सांस्कृतिक उत्थान किया।
6. कवि, लेखक और ऐतिहासिक स्रोत (Sources)
हम्मीर के काल और उनके व्यक्तित्व की जानकारी निम्नलिखित स्रोतों से मिलती है:
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रसिक प्रिया (Rasik Priya): महाराणा कुम्भा ने जयदेव के ‘गीत गोविंद’ पर जो टीका लिखी, उसमें हम्मीर को ‘वीर राजा’ कहा है।
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कीर्ति स्तंभ प्रशस्ति (1460 ई.): इसमें हम्मीर की विजयों और ‘विषम घाटी पंचानन’ की उपाधि का उल्लेख है।
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कुंभलगढ़ प्रशस्ति: इसमें उन्हें ‘परम गुरु’ और एक महान विजेता बताया गया है।
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नैणसी री ख्यात: मुँहणोत नैणसी ने हम्मीर द्वारा चित्तौड़ जीतने की कथा का विस्तार से वर्णन किया है।
7. सूक्ष्म बारीकियाँ (The Minute Details)
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प्रथम सिसोदिया शासक: वे पहले शासक थे जिन्होंने सिसोदिया नाम को राजवंश की मुख्य पहचान बनाया।
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सत्यव्रत: इतिहासकार उन्हें ‘सत्यव्रत’ का धनी मानते हैं, जिन्होंने विषम परिस्थितियों में भी अपने पूर्वजों के वचन को निभाया।
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छापामार युद्ध का जनक: मेवाड़ में पहाड़ियों का उपयोग कर युद्ध जीतने की कला को हम्मीर ने ही पुनर्जीवित किया, जिसे बाद में महाराणा प्रताप ने चरमोत्कर्ष पर पहुँचाया।
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हम्मीर और बारहट: उन्होंने चारणों (बारहटों) को बहुत सम्मान दिया, जिसका परिणाम यह हुआ कि चारणों ने मेवाड़ के लिए कई बलिदान दिए।
राणा हम्मीर: एक नज़र में (Table)
| श्रेणी | विवरण |
| शासन काल | 1326 – 1364 ई.। |
| विशिष्ट उपलब्धि | चित्तौड़ को तुर्कों से मुक्त कराया (1326)। |
| प्रमुख युद्ध | सिंगोली का युद्ध (मोहम्मद बिन तुग़लक़ के विरुद्ध)। |
| उपाधि | मेवाड़ का उद्धारक, विषम घाटी पंचानन। |
| कुल देवी मंदिर | अन्नपूर्णा माता मंदिर (चित्तौड़)। |
| ऐतिहासिक महत्व | सिसोदिया राजवंश की स्थापना। |
निष्कर्ष:
राणा हम्मीर वह मशाल थे जिन्होंने मेवाड़ के बुझते हुए दीप को पुनः प्रज्वलित किया। यदि वे चित्तौड़ को वापस नहीं जीतते, तो शायद मेवाड़ का वह महान इतिहास नहीं होता जिसे आज हम जानते हैं।