महाराणा मोकल (शासनकाल: 1421–1433 ई.) मेवाड़ के सिसोदिया राजवंश के एक महत्वपूर्ण शासक थे। उनका जीवन और शासनकाल पारिवारिक त्याग, कूटनीति और कलात्मक पुनर्जागरण का अनूठा उदाहरण है। वे राणा लाखा के पुत्र और महान महाराणा कुम्भा के पिता थे।
यहाँ महाराणा मोकल के बारे में हर बारीक जानकारी दी गई है:
1. उत्पत्ति और पारिवारिक पृष्ठभूमि (Origin & Family)
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वंश: सिसोदिया राजवंश।
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माता-पिता: पिता राणा लाखा और माता हंसाबाई (मारवाड़ के राव चूंडा की पुत्री)।
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जन्म का संदर्भ: इनका जन्म एक ऐतिहासिक संधि के तहत हुआ था। ज्येष्ठ भाई कुंवर चूंडा ने मोकल के लिए सिंहासन का त्याग किया और स्वयं ‘मेवाड़ के भीष्म’ कहलाए।
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संरक्षक: शुरुआती वर्षों में कुंवर चूंडा इनके संरक्षक रहे, लेकिन हंसाबाई के अविश्वास के कारण चूंडा मांडू (मालवा) चले गए। इसके बाद हंसाबाई के भाई रणमल राठौड़ मेवाड़ के संरक्षक बने।
2. सैन्य उपलब्धियाँ और युद्ध (Wars & Conquests)
मोकल एक वीर सेनापति थे जिन्होंने मेवाड़ की सीमाओं का विस्तार किया:
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रामपुरा का युद्ध (1428 ई.): उन्होंने नागौर के शासक फिरोज खाँ को पराजित किया।
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झीलवाड़ा का युद्ध (1433 ई.): अहमदशाह (गुजरात) ने जब मेवाड़ पर आक्रमण किया, तो मोकल उसका सामना करने के लिए झीलवाड़ा (राजसमंद) पहुँचे।
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जालौर और सांभर विजय: उन्होंने जालौर के चौहानों को पराजित किया और सांभर के क्षेत्र पर अधिकार किया।
3. स्थापत्य और निर्माण परियोजनाएँ (Architecture)
मोकल कला और मंदिर निर्माण के बड़े संरक्षक थे:
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समिधेश्वर मंदिर (चित्तौड़): इन्होंने चित्तौड़ दुर्ग में स्थित ‘त्रिभुवन नारायण मंदिर’ (परमार राजा भोज द्वारा निर्मित) का जीर्णोद्धार करवाया, जिसे अब ‘मोकल जी का मंदिर’ या ‘समिधेश्वर मंदिर’ कहा जाता है।
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एकलिंग जी का परकोटा: इन्होंने कैलाशपुरी (उदयपुर) में स्थित एकलिंग नाथ जी के मंदिर के चारों ओर विशाल परकोटे (प्राचीर) का निर्माण करवाया।
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बाघैला तालाब: अपनी रानी बाघैली के नाम पर चित्तौड़ में इस तालाब का निर्माण करवाया।
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द्वारिकानाथ मंदिर: इन्होंने चित्तौड़ में विष्णु भगवान के इस मंदिर का निर्माण करवाया।
4. राजदरबार, कवि और लेखक (Court & Intellectuals)
मोकल के दरबार में विद्वानों और शिल्पियों का विशेष स्थान था:
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प्रमुख विद्वान: * योगेश्वर और भट्ट विष्णु: ये इनके दरबार के सबसे प्रसिद्ध विद्वान थे।
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शिल्पी (Architects): मोकल के समय के सबसे महान शिल्पी फणा, मन्ना और विशाल थे। इन्होंने ही मोकल की स्थापत्य योजनाओं को धरातल पर उतारा।
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लेखक: उनके समय के शिलालेखों (जैसे शृंगी ऋषि का शिलालेख) में उनके धर्म और वीरता का वर्णन मिलता है।
5. हत्या और दुखद अंत (1433 ई.)
मोकल का अंत उनके ही परिवार के लोगों के छल से हुआ:
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षड्यंत्रकारी: राणा क्षेत्रसिंह (खेता) के दासी पुत्र चाचा और मेरा।
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कारण: वे स्वयं को अपमानित महसूस करते थे और सत्ता की महत्वाकांक्षा रखते थे। उन्हें महपा पँवार का भी समर्थन प्राप्त था।
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घटना: 1433 ई. में जब मोकल गुजरात के अहमदशाह के विरुद्ध अभियान पर झीलवाड़ा में पड़ाव डाले हुए थे, तब चाचा और मेरा ने धोखे से उनकी हत्या कर दी।
6. ऐतिहासिक स्रोत और सूक्ष्म बारीकियाँ (Sources & Minute Details)
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शृंगी ऋषि का शिलालेख (1428 ई.): इस शिलालेख में मोकल की विजयों, उनके धार्मिक कार्यों और गया (बिहार) में उनके द्वारा बनवाए गए मंदिरों का उल्लेख है।
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हस्तकला: मोकल के समय मेवाड़ में मूर्तिकला और नक्काशी का काम अपनी चरम अवस्था की ओर बढ़ रहा था, जिसकी पूर्णता बाद में कुम्भा के काल में दिखी।
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उपाधियाँ: उन्हें तत्कालीन अभिलेखों में ‘महाराणा’ और ‘धार्मिक रक्षक’ के रूप में संबोधित किया गया है।
महाराणा मोकल: एक नज़र में (Table)
| श्रेणी | विवरण |
| शासन काल | 1421 – 1433 ई.। |
| पिता / माता | राणा लाखा / हंसाबाई। |
| संरक्षक | कुंवर चूंडा, बाद में रणमल राठौड़। |
| प्रसिद्ध मंदिर | समिधेश्वर मंदिर (चित्तौड़)। |
| दरबारी शिल्पी | फणा, मन्ना, और विशाल। |
| मृत्यु का स्थान | झीलवाड़ा (चाचा और मेरा द्वारा हत्या)। |
निष्कर्ष:
महाराणा मोकल का शासनकाल मेवाड़ के लिए एक तैयारी का दौर था। उन्होंने उस नींव को मजबूत किया जिस पर उनके पुत्र महाराणा कुम्भा ने एक विशाल और अपराजेय साम्राज्य का निर्माण किया।