महाराणा संग्राम सिंह प्रथम, जिन्हें इतिहास में महाराणा सांगा (शासनकाल: 1509–1527 ई.) के नाम से जाना जाता है, मध्यकालीन भारत के सबसे शक्तिशाली हिंदू सम्राट थे। उन्हें ‘हिंदूपत’ की उपाधि दी गई थी। कर्नल जेम्स टॉड ने उन्हें ‘सैनिकों का भग्नावशेष’ (A Fragment of a Soldier) कहा है, क्योंकि उनके शरीर पर युद्धों के 80 घाव थे, एक हाथ कटा हुआ था, एक पैर से लंगड़े थे और एक आँख फूटी हुई थी।
यहाँ महाराणा सांगा के बारे में हर बारीक जानकारी दी गई है:
1. उत्पत्ति और प्रारंभिक संघर्ष (Origin & Early Life)
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वंश: सिसोदिया राजवंश।
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माता-पिता: पिता महाराणा रायमल और माता रत्नकुंवरी।
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भाइयों से संघर्ष: सांगा का अपने भाइयों (पृथ्वीराज और जयमल) के साथ उत्तराधिकार के लिए भयंकर संघर्ष हुआ। एक ज्योतिषी की भविष्यवाणी (कि सांगा राजा बनेंगे) के कारण पृथ्वीराज ने उन पर हमला किया, जिससे सांगा की एक आँख चली गई।
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शरण: संघर्ष के दौरान सांगा ने अजमेर के करमचन्द पंवार के पास अज्ञातवास में शरण ली।
2. प्रमुख युद्ध और विजय (Major Wars)
सांगा ने उत्तर भारत के लगभग सभी मुस्लिम सुल्तानों को पराजित किया:
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खातोली का युद्ध (1517 ई.): दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी को हराया। (इस युद्ध में सांगा ने अपना बायां हाथ खो दिया)।
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बाड़ी का युद्ध (1518 ई.): धौलपुर के पास पुनः इब्राहिम लोदी की सेना को परास्त किया।
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गागरोन का युद्ध (1519 ई.): मालवा के सुल्तान महमुद खिलजी II को हराया और उसे बंदी बना लिया।
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ईडर का युद्ध: गुजरात के सुल्तान मुजफ्फर शाह को पराजित कर अपने पसंदीदा व्यक्ति को गद्दी पर बिठाया।
3. निर्णायक युद्ध (The Decisive Battles)
1526 में दिल्ली में मुगल सत्ता (बाबर) के आने के बाद संघर्ष और बढ़ गया:
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बयाना का युद्ध (फरवरी 1527): सांगा ने बाबर की सेना को बुरी तरह हराया। यह बाबर की भारत में पहली बड़ी हार थी।
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खानवा का युद्ध (17 मार्च 1527): * स्थान: भरतपुर की रूपवास तहसील।
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पाती पेरण: सांगा ने राजस्थान के सभी राजाओं को पत्र लिखकर विदेशी आक्रमणकारी (बाबर) के खिलाफ एकजुट किया।
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हार का कारण: बाबर की ‘तुलगुमा पद्धति’ और ‘तोपखाना’। सांगा घायल हो गए और उन्हें युद्ध के मैदान से बाहर ले जाया गया।
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4. स्थापत्य और प्रशासनिक योगदान (Architecture)
सांगा का पूरा जीवन युद्धों में बीता, इसलिए उनके समय में नई निर्माण परियोजनाएँ कम रहीं, लेकिन:
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किलेबंदी: उन्होंने चित्तौड़ और कुंभलगढ़ के रक्षा तंत्र को और भी मजबूत किया।
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धार्मिक निर्माण: उन्होंने कई मंदिरों का जीर्णोद्धार करवाया और ब्राह्मणों को गाँव दान में दिए।
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रणथंभौर: सांगा ने रणथंभौर को अपनी सामरिक गतिविधियों का एक प्रमुख केंद्र बनाया था।
5. राजदरबार और विद्वत्ता (Court & Intellectuals)
सांगा का दरबार शौर्य का प्रतीक था:
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विद्वानों का आश्रय: उनके दरबार में संस्कृत और राजस्थानी के विद्वानों का सम्मान था।
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प्रमुख व्यक्तित्व: * अशोक परमार: सांगा ने इनकी वीरता से खुश होकर इन्हें ‘ऊपरमाल’ (भीलवाड़ा) की जागीर दी थी।
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करमचन्द पंवार: उनके सबसे भरोसेमंद सलाहकार और सामंत।
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कवि और लेखक: उनके समय की वीरता का वर्णन ‘सांगा रासो’ और बाद के ग्रंथों में मिलता है।
6. सूक्ष्म बारीकियाँ (The Minute Details)
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शरीर पर 80 घाव: खानवा के युद्ध के समय उनके शरीर पर तलवारों और भालों के 80 निशान थे।
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अंतिम प्रतिज्ञा: खानवा में घायल होने के बाद जब उन्हें होश आया, तो उन्होंने प्रतिज्ञा की कि “जब तक मैं बाबर को हरा नहीं देता, तब तक चित्तौड़ में कदम नहीं रखूँगा और सिर पर पगड़ी नहीं पहनूँगा।” वे तब तक सिर पर साफा (टोपा) पहनते रहे।
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मृत्यु (30 जनवरी 1528): उन्हें उनके ही कुछ सामंतों द्वारा कालपी (MP) में ज़हर दे दिया गया, क्योंकि वे बाबर से पुनः युद्ध नहीं चाहते थे।
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समाधि: उनका अंतिम संस्कार माण्डलगढ़ (भीलवाड़ा) में किया गया, जहाँ आज भी उनकी 8 खंभों की छतरी बनी हुई है।
महाराणा सांगा: एक नज़र में (Table)
| श्रेणी | विवरण |
| शासन काल | 1509 – 1527 ई.। |
| उपाधि | हिंदूपत, सैनिकों का भग्नावशेष। |
| सबसे बड़ी भूल | बयाना विजय के बाद बाबर को संभलने का मौका देना। |
| प्रथा | ‘पाती पेरण’ (सभी राजपूतों को युद्ध के लिए आमंत्रित करना)। |
| अंतिम विश्राम स्थल | माण्डलगढ़ (भीलवाड़ा)। |
| युद्ध कौशल | हाथियों की सेना और तलवारबाजी में निपुण। |
निष्कर्ष:
महाराणा सांगा ने एक बार फिर भारत में हिंदू साम्राज्य की स्थापना का स्वप्न देखा था। यदि खानवा के युद्ध का परिणाम पक्ष में होता, तो भारत का इतिहास बिल्कुल अलग होता। वे अंतिम भारतीय राजा थे जिनके नेतृत्व में सभी राजपूत राजा एक झंडे के नीचे लड़ने आए थे।