महाराणा फतेह सिंह (शासनकाल: 1884–1930 ई.) मेवाड़ के उन गिने-चुने शासकों में से हैं जिन्होंने ब्रिटिश काल में रहते हुए भी अपनी संप्रभुता और आत्मसम्मान से कभी समझौता नहीं किया। उन्हें एक ‘ऋषि-तुल्य राजा’ माना जाता था। वे मेवाड़ की उस प्राचीन परंपरा के प्रतीक थे जो “धर्म पर अडिग” रहती है।
यहाँ महाराणा फतेह सिंह के बारे में विस्तृत और सूक्ष्म जानकारी दी गई है:
1. उत्पत्ति और परिवार (Origin & Family)
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वंश: सिसोदिया राजवंश (शिवरती शाखा)।
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पिता: महाराज दल सिंह।
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राज्याभिषेक: महाराणा सज्जन सिंह की निःसंतान मृत्यु के बाद 1884 ई. में इन्हें गोद लिया गया।
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पुत्र: उनके उत्तराधिकारी महाराणा भूपाल सिंह थे।
2. ‘चेतावनी रा चूंगट्या’ और दिल्ली दरबार (1903 ई.)
यह उनके जीवन की सबसे प्रसिद्ध ऐतिहासिक घटना है:
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पृष्ठभूमि: लॉर्ड कर्जन ने दिल्ली में एक भव्य दरबार आयोजित किया था, जिसमें फतेह सिंह को भी आमंत्रित किया गया।
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केसरी सिंह बारहट का योगदान: प्रसिद्ध क्रांतिकारी केसरी सिंह बारहट ने महाराणा के स्वाभिमान को जगाने के लिए डिंगल भाषा में 13 सोरठे (दोहे) लिखे, जिन्हें ‘चेतावनी रा चूंगट्या’ कहा जाता है।
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परिणाम: इन दोहों को पढ़कर महाराणा इतने प्रभावित हुए कि वे दिल्ली पहुँचने के बावजूद दरबार में शामिल नहीं हुए और वापस उदयपुर लौट आए। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि मेवाड़ का सिर किसी विदेशी शक्ति के आगे नहीं झुकता।
3. स्थापत्य परियोजनाएँ (Architecture)
महाराणा फतेह सिंह ने मेवाड़ को प्राकृतिक सुंदरता और आधुनिकता का संगम बनाया:
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फतेह सागर झील (1889 ई.): कनाट के ड्यूक (Duke of Connaught) के आगमन पर इन्होंने ‘कनाट बांध’ की नींव रखी और झील का विस्तार किया, जिसे आज फतेह सागर के नाम से जाना जाता है।
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शिव निवास पैलेस: सिटी पैलेस के भीतर इन्होंने इस भव्य महल का निर्माण करवाया, जो अपनी अर्धवृत्ताकार संरचना के लिए प्रसिद्ध है।
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चित्तौड़गढ़ का पुनरुद्धार: इन्होंने चित्तौड़ दुर्ग के कुंभा महलों और पद्मिनी महल का संरक्षण करवाया।
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विक्टोरिया मेमोरियल हॉल: गुलाब बाग में स्थित इस पुस्तकालय और संग्रहालय के निर्माण को पूर्ण करवाया।
4. शासनकाल की चुनौतियाँ और सुधार (Challenges & Reforms)
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छप्पनिया अकाल (1899-1900 ई.): इनके समय में विक्रम संवत 1956 में भीषण अकाल पड़ा। महाराणा ने जनता को बचाने के लिए खजाना खोल दिया और व्यापक अकाल राहत कार्य (जैसे रेल लाइन बिछाना) शुरू किए।
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बिजोलिया किसान आंदोलन: इनके शासनकाल में ही भारत का सबसे लंबा चलने वाला किसान आंदोलन (1897 में) शुरू हुआ। शुरुआत में महाराणा किसानों के प्रति सहानुभूति रखते थे, लेकिन बाद में ब्रिटिश और सामंती दबाव के कारण स्थिति जटिल हो गई।
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रेलवे का विस्तार: उदयपुर को चित्तौड़गढ़ से जोड़ने वाली रेलवे लाइन (Udaipur-Chittorgarh Railway) इन्हीं के समय पूर्ण हुई।
5. राजदरबार, कवि और लेखक (Court & Literature)
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कविराज श्यामलदास: इन्होंने श्यामलदास के ‘वीर विनोद’ के प्रकाशन पर रोक लगा दी थी, क्योंकि उन्हें लगा कि इसमें मेवाड़ के राजपरिवार की कुछ व्यक्तिगत जानकारी और अंग्रेजों के प्रति कुछ संवेदनशील बातें लिखी गई थीं।
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धार्मिक आस्था: वे एकलिंग जी के परम भक्त थे। वे अपना अधिकांश समय पूजा-पाठ और शास्त्रों के अध्ययन में बिताते थे।
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सादगी: ब्रिटिश अधिकारियों के अनुसार, फतेह सिंह की सादगी और उनका व्यक्तित्व इतना प्रभावशाली था कि बड़े से बड़ा अंग्रेज अधिकारी भी उनके सामने संकोच करता था।
6. अंतिम वर्ष और सत्ता हस्तांतरण (The Minute Details)
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विवाद (1921 ई.): मेवाड़ में किसानों के असंतोष और ‘मोतीलाल तेजावत’ के आंदोलन के कारण अंग्रेजों ने दबाव बनाया कि महाराणा शासन की शक्तियाँ अपने पुत्र भूपाल सिंह को सौंप दें।
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अधिकारों में कटौती: 1921 में उन्हें केवल धार्मिक और नाममात्र के अधिकार दिए गए, जबकि प्रशासनिक शक्तियाँ युवराज भूपाल सिंह को हस्तांतरित कर दी गईं।
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मृत्यु (1930 ई.): लगभग 46 वर्षों के लंबे शासन के बाद 1930 में उनका देहांत हुआ।
महाराणा फतेह सिंह: एक नज़र में (Table)
| श्रेणी | विवरण |
| शासन काल | 1884 – 1930 ई.। |
| मुख्य विशेषता | अदम्य स्वाभिमान और ब्रिटिश विरोधी तेवर। |
| ऐतिहासिक सोरठे | ‘चेतावनी रा चूंगट्या’ (केसरी सिंह बारहट)। |
| प्रमुख निर्माण | फतेह सागर झील, शिव निवास पैलेस। |
| बड़ी चुनौती | छप्पनिया अकाल और बिजोलिया आंदोलन। |
| उपाधि | हिंदुआ सूरज (यथार्थ अर्थों में)। |
निष्कर्ष:
महाराणा फतेह सिंह मेवाड़ के अंतिम ऐसे शासक थे जिन्होंने ब्रिटिश राज के स्वर्ण काल में भी मेवाड़ की पुरानी शान और ‘एकलिंग जी का दीवान’ होने के गौरव को जीवित रखा। वे वास्तव में एक ‘राजर्षि’ थे।
क्या आप मेवाड़ के अंतिम महाराणा महाराणा भूपाल सिंह के बारे में जानना चाहेंगे, जिनके समय में राजस्थान का एकीकरण हुआ और मेवाड़ भारत संघ में शामिल हुआ?