विग्रहराज द्वितीय

विग्रहराज द्वितीय (Vigraharaja II) चौहान वंश के सबसे प्रतापी प्रारंभिक शासकों में से एक थे। उनका शासनकाल लगभग 971 ई. से 998 ई. तक रहा। उन्हें चौहानों की शक्ति को राजस्थान के बाहर ले जाने और वंश को एक नई ऊंचाई पर पहुँचाने का श्रेय दिया जाता है।

विग्रहराज द्वितीय के बारे में महत्वपूर्ण विवरण निम्नलिखित हैं:


1. साम्राज्य विस्तार और गुजरात विजय

विग्रहराज द्वितीय की सबसे बड़ी सैन्य उपलब्धि गुजरात के चालुक्य (सोलंकी) राजा मूलराज प्रथम पर विजय थी:

  • उन्होंने मूलराज प्रथम को बुरी तरह पराजित किया और उसे भागकर कंठकोट के किले में शरण लेनी पड़ी।

  • इस विजय के बाद विग्रहराज ने गुजरात के ‘भड़ौच’ (Broach) तक अपने साम्राज्य का विस्तार किया।

2. आशापुरा माता मंदिर का निर्माण

गुजरात विजय के दौरान, उन्होंने भड़ौच (नर्मदा नदी के किनारे) में अपनी कुलदेवी आशापुरा माता के एक भव्य मंदिर का निर्माण करवाया। यह मंदिर आज भी चौहानों की आस्था का प्रमुख केंद्र है।

3. ‘मतंग’ की उपाधि

ऐतिहासिक साक्ष्यों (जैसे पृथ्वीराज विजय) के अनुसार, विग्रहराज द्वितीय को उनकी विशाल सेना और शक्ति के कारण ‘मतंग’ (हाथी के समान बलशाली) की उपाधि से भी संबोधित किया गया है।

4. ऐतिहासिक साक्ष्य (हर्षनाथ शिलालेख – 961 ई.)

यद्यपि हर्षनाथ शिलालेख उनके पिता सिंहराज के समय का है, लेकिन विग्रहराज द्वितीय के समय के बारे में जानकारी उनके द्वारा जारी किए गए दानपत्रों और बाद के चौहान अभिलेखों से मिलती है। वे अपने पिता सिंहराज (जिन्होंने चौहानों को पूर्ण स्वतंत्र घोषित किया था) के योग्य पुत्र साबित हुए।

5. राजनीतिक प्रभाव

विग्रहराज द्वितीय के समय तक चौहान वंश केवल एक क्षेत्रीय शक्ति नहीं रह गया था, बल्कि उत्तर भारत की राजनीति में एक अनिवार्य नाम बन चुका था। उन्होंने प्रतिहारों के पतन के बाद खाली हुई राजनीतिक जगह को भरने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।


संक्षेप में:

क्षेत्र विवरण
पिता सिंहराज चौहान
मुख्य शत्रु मूलराज सोलंकी (गुजरात)
धार्मिक योगदान भड़ौच में आशापुरा माता मंदिर
विशेषता दक्षिण की ओर साम्राज्य विस्तार करने वाले प्रथम बड़े चौहान राजा

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