वाग्भट्ट चौहान रणथंभौर शाखा के सबसे कुशल और साहसी शासकों में से एक थे। उन्होंने उस समय सत्ता संभाली जब चौहानों का अस्तित्व संकट में था और रणथंभौर दुर्ग पर दिल्ली सल्तनत का कब्जा हो चुका था।
वाग्भट्ट के बारे में विस्तृत विवरण निम्नलिखित है:
1. सत्ता का पुनरुद्धार (Reclaiming the Empire)
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परिस्थितियाँ: वीरनारायण की हत्या के बाद इल्तुतमिश ने रणथंभौर पर कब्जा कर लिया था। वाग्भट्ट (जो वीरनारायण के चाचा थे) को मालवा की ओर शरण लेनी पड़ी।
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वापसी: इल्तुतमिश की मृत्यु के बाद जब दिल्ली सल्तनत में कमजोरी आई, तो वाग्भट्ट ने मालवा से लौटकर अपनी सेना संगठित की।
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विजय: उन्होंने 1236 ई. के आसपास तुर्क सेना को हराकर रणथंभौर दुर्ग पर पुनः चौहानों का झंडा फहराया।
2. दिल्ली सल्तनत को कड़ी चुनौती
वाग्भट्ट का शासनकाल दिल्ली के सुल्तानों के साथ निरंतर संघर्ष का रहा:
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रजिया सुल्तान और बहराम शाह: इनके समय में भी तुर्कों ने रणथंभौर को वापस लेने की कोशिश की, लेकिन वाग्भट्ट ने अपनी रक्षात्मक कूटनीति से उन्हें सफल नहीं होने दिया।
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नासिरुद्दीन महमूद और बलबन: सुल्तान नासिरुद्दीन महमूद के समय (1248 ई. और 1253 ई. में) बलबन ने रणथंभौर पर बड़े आक्रमण किए। वाग्भट्ट ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए बलबन जैसे शक्तिशाली सेनापति को भी खाली हाथ लौटने पर मजबूर कर दिया।
3. निर्माण और सुदृढ़ीकरण
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उन्होंने रणथंभौर दुर्ग की घेराबंदी को और अधिक अभेद्य बनाया।
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उन्होंने अपनी सेना में घुड़सवारों और हाथी सेना को विशेष रूप से प्रशिक्षित किया, जिससे वे पहाड़ी युद्धकला में निपुण हो सके।
4. साहित्यिक संदर्भ
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हम्मीर महाकाव्य: नयनचंद्र सूरी ने वाग्भट्ट को एक वीर और चतुर शासक के रूप में वर्णित किया है, जिसने शत्रुओं के छक्के छुड़ा दिए थे।
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इतिहासकार उन्हें ‘रणथंभौर का उद्धारक’ भी मानते हैं, क्योंकि यदि वे दुर्ग को वापस नहीं जीतते, तो यह शाखा वहीं समाप्त हो गई होती।
5. उत्तराधिकार
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वाग्भट्ट के बाद उनके पुत्र जैत्रसिंह (जयसिंह) शासक बने, जिन्होंने 32 वर्षों तक शासन किया।
वाग्भट्ट चौहान – मुख्य विशेषताएँ
| क्षेत्र | विवरण |
| भूमिका | रणथंभौर में चौहान सत्ता को पुनर्जीवित करने वाले शासक। |
| प्रमुख शत्रु | इल्तुतमिश के उत्तराधिकारी और गयासुद्दीन बलबन। |
| युद्ध नीति | छापामार और पहाड़ी युद्ध पद्धति (Guerilla Warfare) का सफल प्रयोग। |
| उपलब्धि | दिल्ली सल्तनत के सबसे शक्तिशाली सुल्तानों को दुर्ग से दूर रखा। |
निष्कर्ष:
वाग्भट्ट एक रणनीतिकार योद्धा थे। उन्होंने न केवल खोया हुआ राज्य वापस पाया, बल्कि उसे इतना मजबूत बनाया कि आने वाली पीढ़ियों (जैसे हम्मीर देव) को एक सुरक्षित और शक्तिशाली साम्राज्य विरासत में मिला। वे रणथंभौर के इतिहास के एक ‘लौह पुरुष’ थे।