जैत्रसिंह (जिन्हें जयसिंह के नाम से भी जाना जाता है) रणथंभौर के चौहान वंश के एक अत्यंत स्थिर और न्यायप्रिय शासक थे। उनका शासनकाल लगभग 1250 ई. से 1282 ई. तक रहा। वे वाग्भट्ट के पुत्र थे और प्रसिद्ध हम्मीर देव चौहान के पिता थे।
जैत्रसिंह के शासनकाल की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:
1. दीर्घकालिक और स्थिर शासन
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जैत्रसिंह ने रणथंभौर पर 32 वर्षों तक शासन किया।
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उनका यह 32 वर्षों का काल शांति, सुदृढ़ीकरण और न्याय के लिए जाना जाता है। उन्होंने अपने राज्य की सीमाओं को सुरक्षित रखा और प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत किया।
2. दिल्ली सल्तनत से संघर्ष
अपने पिता वाग्भट्ट की तरह, जैत्रसिंह को भी दिल्ली के सुल्तानों के आक्रमणों का सामना करना पड़ा:
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नसीरुद्दीन महमूद और बलबन: दिल्ली के सुल्तान नसीरुद्दीन महमूद के समय बलबन ने कई बार रणथंभौर को जीतने का प्रयास किया, लेकिन जैत्रसिंह की सैन्य कुशलता के कारण तुर्क सेना सफल नहीं हो पाई।
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उन्होंने अपनी कूटनीति से रणथंभौर को दिल्ली के सीधे नियंत्रण से मुक्त रखा।
3. ‘न्याय की छतरी’ (32 खंभों की छतरी)
जैत्रसिंह के शासनकाल की सबसे बड़ी यादगारी रणथंभौर दुर्ग में स्थित 32 खंभों की छतरी है:
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निर्माण: इसका निर्माण उनके पुत्र हम्मीर देव चौहान ने करवाया था।
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उद्देश्य: चूंकि जैत्रसिंह ने 32 वर्षों तक शासन किया था, इसलिए उनकी याद में 32 खंभे लगाए गए।
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इसे ‘न्याय की छतरी’ कहा जाता है क्योंकि हम्मीर देव यहाँ बैठकर अपनी प्रजा को न्याय दिया करते थे।
4. उत्तराधिकार का निर्णय
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जैत्रसिंह के तीन पुत्र थे, जिनमें हम्मीर देव सबसे योग्य थे।
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अपने जीवनकाल में ही, 1282 ई. में जैत्रसिंह ने हम्मीर देव का राज्याभिषेक कर दिया और स्वयं राजकाज से निवृत्त हो गए। यह उनकी दूरदर्शिता का प्रमाण था कि उन्होंने अपने जीते-जी एक सक्षम उत्तराधिकारी को सत्ता सौंप दी।
5. ऐतिहासिक महत्व
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जैत्रसिंह ने रणथंभौर को केवल सैन्य दृष्टि से ही नहीं, बल्कि आर्थिक और नैतिक दृष्टि से भी ऊँचा उठाया।
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उनके समय में रणथंभौर एक समृद्ध राज्य बन गया था, जिसकी नींव पर हम्मीर देव ने अपनी महान विजयों की इमारत खड़ी की।
जैत्रसिंह – एक नजर में
| श्रेणी | विवरण |
| शासन अवधि | 32 वर्ष (1250–1282 ई.) |
| उपाधि/पहचान | एक न्यायप्रिय और रक्षक शासक |
| प्रसिद्ध पुत्र | हम्मीर देव चौहान (हठी हम्मीर) |
| मुख्य स्मारक | 32 खंभों की छतरी (रणथंभौर दुर्ग) |
संक्षेप में:
जैत्रसिंह रणथंभौर के इतिहास के वे मौन स्तंभ हैं, जिन्होंने एक कठिन समय में राज्य को स्थिरता दी। उनके न्यायपूर्ण शासन की कहानियाँ आज भी राजस्थान के लोक-इतिहास में गौरव के साथ सुनी जाती हैं।