जालौर के चौहानों का इतिहास राजपूताना के शौर्य और बलिदान का एक अनुपम उदाहरण है। इस शाखा को ‘सोनगरा चौहान’ के नाम से जाना जाता है क्योंकि इन्होंने स्वर्णगिरि (कनकचल) पहाड़ी पर स्थित जालौर दुर्ग पर शासन किया था।
यहाँ जालौर के चौहानों का सामान्य परिचय और उनके आगमन का इतिहास दिया गया है:
1. ये कहाँ से आए? (मूल और स्थापना)
जालौर के चौहान मूल रूप से नाडोल के चौहानों की एक उप-शाखा थे।
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संस्थापक: इस वंश की स्थापना कीर्तिपाल चौहान (जिन्हें ‘कीतू एक महान राजा’ भी कहा गया है) ने की थी।
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स्थापना का समय: कीर्तिपाल ने 1181-82 ई. के आसपास परमारों को पराजित कर जालौर पर अधिकार किया और सोनगरा चौहान वंश की नींव रखी।
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सोनगरा नाम क्यों? जालौर के किले को ‘सोनगढ़’ या ‘स्वर्णगिरि’ कहा जाता था, इसी कारण इस शाखा के चौहान सोनगरा कहलाए।
2. शासन काल (Period of Rule)
जालौर में सोनगरा चौहानों का शासन मुख्य रूप से 1181 ई. से 1311 ई. तक रहा।
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प्रारंभ: 1181 ई. (कीर्तिपाल चौहान द्वारा)।
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अंत: 1311 ई. (कान्हड़देव चौहान की वीरगति और अलाउद्दीन खिलजी के अधिकार के साथ)।
| क्रम | राजा का नाम | शासन काल (ईस्वी) | मुख्य विवरण / उपलब्धि |
| 1 | कीर्तिपाल चौहान | 1181 – 1182 ई. | संस्थापक; नाडोल के अल्हण के पुत्र। परमारों को हराकर जालौर जीता। |
| 2 | समरसिंह | 1182 – 1204 ई. | दुर्ग की सुरक्षा मजबूत की, शस्त्रागार और विशाल प्राचीरें बनवाईं। |
| 3 | उदयसिंह | 1205 – 1257 ई. | शक्तिशाली शासक; इल्तुतमिश के आक्रमण को विफल किया। नाडोल और मांडू तक सीमा विस्तार किया। |
| 4 | चाचिगदेव | 1257 – 1282 ई. | इनके समय राज्य स्थिर रहा। नसीरुद्दीन महमूद और बलबन को चुनौती दी। |
| 5 | सामंतसिंह | 1282 – 1305 ई. | इनके समय जलालुद्दीन खिलजी के आक्रमण हुए। अंत में पुत्र को सत्ता सौंपी। |
| 6 | कान्हड़देव चौहान | 1305 – 1311 ई. | अंतिम और महानतम योद्धा; अलाउद्दीन खिलजी के विरुद्ध ऐतिहासिक युद्ध और साका। |