हम्मीर देव चौहान (शासनकाल: 1282–1301 ई.) रणथंभौर के चौहान वंश के सबसे प्रतापी, साहसी और अंतिम शासक थे। भारतीय इतिहास में उन्हें उनके ‘हठ’ (दृढ़ निश्चय) और ‘शरणागत वत्सलता’ (शरण में आए हुए की रक्षा करना) के लिए सर्वोच्च स्थान प्राप्त है।
हम्मीर देव के बारे में विस्तृत विवरण निम्नलिखित है:
1. प्रारंभिक जीवन और राज्याभिषेक
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पिता: जैत्रसिंह (जयसिंह)।
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राज्याभिषेक: उनके पिता ने अपने जीवनकाल में ही 1282 ई. में उनका राज्याभिषेक कर दिया था।
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दिग्विजय की नीति: गद्दी पर बैठते ही हम्मीर ने चारों दिशाओं में अपने साम्राज्य विस्तार की नीति अपनाई। उन्होंने भीम रस के राजा अर्जुन, धार के भोज परमार और मेवाड़ के समरसिंह को पराजित कर अपनी शक्ति का लोहा मनवाया।
2. हम्मीर का ‘हठ’ और अलाउद्दीन खिलजी से संघर्ष
हम्मीर देव और दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के बीच युद्ध का मुख्य कारण हम्मीर का नैतिक हठ था:
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विद्रोही को शरण: अलाउद्दीन खिलजी के विद्रोही मंगोल सेनापति मोहम्मद शाह और केहब्रू ने हम्मीर की शरण ली थी।
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हठ: अलाउद्दीन ने मोहम्मद शाह को वापस मांगा, लेकिन हम्मीर ने राजपूत परंपरा का पालन करते हुए कहा कि “शरण में आए हुए की रक्षा करना मेरा धर्म है, चाहे इसके लिए मुझे सर्वस्व बलिदान करना पड़े।”
इसी संदर्भ में यह प्रसिद्ध दोहा कहा गया है:
“सिंह सवन सत्पुरुष वचन, कदली फलत इक बार।
तिरिया तेल हम्मीर हठ, चढ़े न दूजी बार॥”
3. रणथंभौर का युद्ध (1301 ई.)
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घेराबंदी: अलाउद्दीन खिलजी ने स्वयं विशाल सेना लेकर रणथंभौर दुर्ग को घेरा। लंबे समय तक घेराबंदी के बावजूद जब वह सफल नहीं हुआ, तो उसने छल का सहारा लिया।
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विश्वासघात: हम्मीर के दो सेनापतियों—रणमल और रतिपाल—को अलाउद्दीन ने दुर्ग का लालच देकर अपनी ओर मिला लिया। उन्होंने दुर्ग के गुप्त रास्तों और खाद्य सामग्री में मिलावट की जानकारी तुर्कों को दे दी।
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राजस्थान का प्रथम साका (11 जुलाई, 1301):
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केसरिया: हम्मीर देव ने अपने अंतिम योद्धाओं के साथ केसरिया बाना पहनकर युद्ध किया और वीरगति प्राप्त की।
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जौहर: उनकी रानी रंगादेवी के नेतृत्व में राजपूत महिलाओं ने जल जौहर (पद्मला तालाब में) किया। यह राजस्थान के इतिहास का पहला आधिकारिक ‘साका’ माना जाता है।
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4. निर्माण और सांस्कृतिक योगदान
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32 खंभों की छतरी: अपने पिता जैत्रसिंह के 32 वर्षों के शासन की याद में उन्होंने इस भव्य छतरी का निर्माण करवाया, जिसे ‘न्याय की छतरी’ कहा जाता है।
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पद्मला तालाब: अपनी पुत्री ‘पद्मला’ (देवल दे) की याद में इस तालाब का नामकरण किया।
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विद्वानों को आश्रय: उनके दरबार में बीजादित्य जैसे महान कवि और विद्वान थे।
5. हम्मीर देव पर आधारित प्रमुख ग्रंथ
उनकी वीरता इतनी प्रभावशाली थी कि कई लेखकों ने उन पर महाकाव्य लिखे:
| ग्रंथ | लेखक |
| हम्मीर महाकाव्य | नयनचंद्र सूरी |
| हम्मीर रासो | जोधराज / सारंगधर |
| हम्मीर हठ | चंद्रशेखर |
| हम्मीर मदमर्दन | जयसिंह सूरी |
निष्कर्ष
हम्मीर देव चौहान का अंत रणथंभौर के चौहान वंश का अंत था, लेकिन उनकी मृत्यु ने उन्हें एक लोकनायक बना दिया। वे एक ऐसे राजा थे जिन्होंने कूटनीति से ऊपर उठकर अपने सिद्धांतों और अपनी शरण में आए व्यक्ति की जान बचाने के लिए अपने पूरे वंश और साम्राज्य की आहुति दे दी।