राव राजा उम्मेद सिंह

राव राजा उम्मेद सिंह (शासनकाल: 1748–1770 ई.) बूंदी के हाड़ा राजवंश के सबसे लोकप्रिय और कलाप्रेमी शासकों में से एक थे। वे राव राजा बुद्धसिंह के पुत्र थे। उनका जीवन संघर्ष से शुरू हुआ, लेकिन उनका शासनकाल बूंदी के लिए सांस्कृतिक और कलात्मक स्वर्ण युग सिद्ध हुआ।

इतिहास में उन्हें ‘श्रीजी’ के नाम से भी जाना जाता है।


1. सत्ता के लिए संघर्ष और पुनः प्राप्ति

उम्मेद सिंह का बचपन अपने पिता के खोये हुए राज्य को वापस पाने के संघर्ष में बीता:

  • मराठों का सहयोग: अपने पिता बुद्धसिंह की मृत्यु के बाद, उम्मेद सिंह ने मराठों (मल्हार राव होल्कर) की सहायता से सवाई जयसिंह द्वारा समर्थित दलेल सिंह को चुनौती दी।

  • अधिकार (1748 ई.): लंबे संघर्ष के बाद 1748 ई. में वे बूंदी की गद्दी पर बैठने में सफल हुए। हालांकि, इस सहायता के बदले बूंदी को मराठों को भारी कर (चौथ) देना पड़ा।

2. बूंदी चित्रकला का स्वर्ण युग (Golden Age of Art)

उम्मेद सिंह का काल बूंदी चित्रकला शैली के चरमोत्कर्ष का समय था:

  • चित्रशाला (Chitrashala): उन्होंने तारागढ़ दुर्ग में ‘चित्रशाला’ का निर्माण करवाया, जिसे ‘भित्ति चित्रों का स्वर्ग’ कहा जाता है। यहाँ की दीवारों पर बने चित्र अपनी बारीकी, रंगों और विषय-वस्तु के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं।

  • विषय वस्तु: उनके समय में शिकार के दृश्य, हाथियों की लड़ाई और विशेषकर ‘नाचते हुए मोर’ के चित्र बहुतायत में बने।

  • स्वयं का चित्रण: एक प्रसिद्ध चित्र में उम्मेद सिंह को जंगली सुअर का शिकार करते हुए दिखाया गया है, जो बूंदी शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है।


3. निर्माण और जनहित कार्य

  • उम्मेद सागर: उन्होंने पेयजल और सिंचाई के लिए ‘उम्मेद सागर’ तालाब का निर्माण करवाया।

  • धार्मिक झुकाव: शासन के अंतिम वर्षों में उनका मन राज-काज से उचट गया और वे पूरी तरह भक्ति मार्ग पर चल पड़े।

4. संन्यास और ‘श्रीजी’ की उपाधि

  • राजपाट का त्याग (1770 ई.): उम्मेद सिंह ने अपने जीवनकाल में ही (1770 ई.) अपने पुत्र अजीत सिंह को राज गद्दी सौंप दी और स्वयं एक संन्यासी का जीवन जीने लगे।

  • लोकप्रियता: संन्यास लेने के बाद वे जनता के बीच ‘श्रीजी’ के नाम से पूजे जाने लगे। यहाँ तक कि जब बाद में बूंदी पर कोई संकट आता, तो वे पुनः शस्त्र उठाकर अपनी प्रजा की रक्षा के लिए खड़े हो जाते थे।


5. ऐतिहासिक स्रोत (Sources)

  • वंश भास्कर: सूर्यमल मिश्रण ने उम्मेद सिंह के संघर्ष, उनकी वीरता और उनके संन्यास का बहुत ही भावुक और विस्तृत वर्णन किया है।

  • कर्नल जेम्स टॉड: टॉड ने उम्मेद सिंह को राजस्थान के सबसे पवित्र और वीर चरित्रों में से एक माना है। उन्होंने लिखा है कि उम्मेद सिंह ने अपनी तलवार और भक्ति से बूंदी को एक नई पहचान दी।

  • चित्रकला अभिलेख: बूंदी के महलों के भित्ति चित्र उनके काल की सबसे जीवंत गवाह हैं।


राव राजा उम्मेद सिंह – मुख्य तथ्य (Table)

श्रेणी विवरण
पिता राव राजा बुद्धसिंह।
उपनाम श्रीजी (Shreeji)।
प्रमुख योगदान बूंदी चित्रकला का विकास और ‘चित्रशाला’ का निर्माण।
विशेषता जीवित रहते हुए राजपाठ त्याग कर संन्यास लिया।
समकालीन घटना मराठों का बढ़ता प्रभाव और कर का बोझ।

निष्कर्ष:

राव राजा उम्मेद सिंह का व्यक्तित्व एक योद्धा और एक संत का अनूठा मिश्रण था। जहाँ उन्होंने तलवार के दम पर अपना खोया हुआ राज्य प्राप्त किया, वहीं अपनी कलात्मक दृष्टि से बूंदी को विश्व के सांस्कृतिक मानचित्र पर अमर कर दिया।

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