राव राजा बुद्धसिंह

राव राजा बुद्धसिंह (शासनकाल: 1695–1739 ई.) बूंदी के हाड़ा राजवंश के 15वें शासक थे। वे राव अनिरुद्ध सिंह के पुत्र थे। उनका शासनकाल वीरता और विद्वत्ता से अधिक राजस्थान की राजनीति में एक विनाशकारी मोड़ के लिए जाना जाता है, क्योंकि इनके समय में ही पहली बार राजपूताना में मराठों का हस्तक्षेप हुआ था।

यहाँ राव राजा बुद्धसिंह के बारे में विस्तृत विवरण दिया गया है:


1. सैन्य सेवा और मुग़ल राजनीति

बुद्धसिंह मुग़ल सम्राट औरंगज़ेब के समय से ही मुग़ल सेवा में थे और बाद में बहादुरशाह प्रथम के अत्यंत प्रिय पात्र बने:

  • जाजाऊ का युद्ध (1707 ई.): औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद हुए उत्तराधिकार युद्ध में बुद्धसिंह ने बहादुरशाह प्रथम (शाह आलम) का साथ दिया। बुद्धसिंह की वीरता से प्रसन्न होकर बहादुरशाह ने उन्हें ‘राव राजा’ की उपाधि दी।

  • साम्राज्यीय सेवा: उन्होंने मुग़ल सत्ता की रक्षा के लिए कई कठिन युद्ध लड़े, लेकिन मुग़ल दरबार की गिरती साख ने उनकी स्थिति को भी प्रभावित किया।

2. मराठों का राजस्थान में प्रवेश (1734 ई.)

बुद्धसिंह के शासनकाल की यह सबसे महत्वपूर्ण और विवादित घटना है:

  • पारिवारिक कलह: बुद्धसिंह की रानी अमर कंवरी (जो सवाई जयसिंह की बहन थी) और बुद्धसिंह के बीच उत्तराधिकार को लेकर मतभेद पैदा हो गए।

  • सवाई जयसिंह का हस्तक्षेप: जयपुर के राजा सवाई जयसिंह ने बूंदी के आंतरिक मामलों में दखल दिया और बुद्धसिंह को हटाकर अपने दामाद दलेल सिंह को बूंदी की गद्दी पर बैठा दिया।

  • मराठों को आमंत्रण: अपने पुत्र उम्मेद सिंह को पुनः गद्दी दिलाने के लिए रानी अमर कंवरी ने 1734 ई. में मराठा सरदार मल्हार राव होल्कर और राणोजी सिंधिया को सहायता के लिए बुलाया।

  • परिणाम: यह पहली बार था जब मराठों ने राजस्थान की किसी रियासत के आंतरिक मामले में सेना सहित प्रवेश किया, जिसने भविष्य में पूरे राजस्थान की राजनीति को बदल दिया।


3. विद्वत्ता और साहित्य (Scholar & Poet)

राजनीतिक उथल-पुथल के बावजूद बुद्धसिंह एक उच्च कोटि के विद्वान और कवि थे:

  • नेह तरंग (Nih Tarang): उन्होंने ‘नेह तरंग’ नामक प्रसिद्ध ग्रंथ की रचना की। यह ग्रंथ हिंदी साहित्य के रीतिकाल का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है, जिसमें प्रेम और श्रृंगार का सुंदर वर्णन है।

  • कला प्रेमी: उनके समय में बूंदी चित्रकला में परिपक्वता आई और उसमें दरबारी भव्यता के साथ-साथ काव्य प्रसंगों का अंकन शुरू हुआ।


4. विस्थापन और अंतिम समय

  • राज्य से निष्कासन: सवाई जयसिंह के प्रभाव के कारण बुद्धसिंह को अपने जीवन के अंतिम वर्ष बड़े कष्ट और विस्थापन में बिताने पड़े। वे लंबे समय तक बेगू (मेवाड़) में रहे।

  • मृत्यु: 1739 ई. में उनका निधन हुआ। वे अपने राज्य को वापस पाने के लिए संघर्ष करते रहे, जिसे बाद में उनके पुत्र उम्मेद सिंह ने मराठों की सहायता से पुनः प्राप्त किया।

5. ऐतिहासिक स्रोत (Sources)

  • वंश भास्कर: सूर्यमल मिश्रण ने बुद्धसिंह के चरित्र, उनकी साहित्यिक प्रतिभा और उनके जीवन के त्रासदपूर्ण अंत का बहुत विस्तार से वर्णन किया है।

  • सवाई जयसिंह का इतिहास: जयपुर के ऐतिहासिक रिकॉर्ड्स में भी बूंदी के उत्तराधिकार संघर्ष और बुद्धसिंह के विरुद्ध की गई कार्यवाहियों का उल्लेख है।

  • मराठा अभिलेख: पेशवाओं के दस्तावेजों में बूंदी से मिले आमंत्रण और वहां से ली गई ‘चौथ’ (कर) का विवरण मिलता है।


राव राजा बुद्धसिंह – मुख्य तथ्य (Table)

श्रेणी विवरण
पिता राव राजा अनिरुद्ध सिंह।
प्रसिद्ध रचना नेह तरंग।
विवादास्पद घटना इनके समय मराठों का राजस्थान में प्रथम प्रवेश (1734)।
प्रतिद्वंद्वी सवाई जयसिंह (आमेर) और दलेल सिंह।
उपाधि राव राजा (बहादुरशाह प्रथम द्वारा)।

निष्कर्ष:

राव राजा बुद्धसिंह का जीवन विरोधाभासों से भरा था—वे एक ओर महान कवि और वीर योद्धा थे, तो दूसरी ओर पारिवारिक विवादों और कूटनीति की बलि चढ़ गए। उनकी एक गलती (या उनकी रानी का निर्णय) ने राजस्थान के द्वार मराठों के लिए हमेशा के लिए खोल दिए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *