महाराणा हम्मीर सिंह II (शासनकाल: 1773–1778 ई.) मेवाड़ के उन शासकों में से हैं जिन्होंने बचपन में ही सत्ता संभाली और बहुत कम उम्र में संसार छोड़ दिया। उनके शासनकाल को “मेवाड़ के इतिहास का संक्रमण काल” कहा जा सकता है, जहाँ सत्ता राजा के हाथ में न होकर सामंतों और राजमाता के हाथों में सिमट गई थी।
यहाँ महाराणा हम्मीर सिंह II के बारे में हर बारीक जानकारी दी गई है:
1. उत्पत्ति और पारिवारिक पृष्ठभूमि (Origin & Family)
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वंश: सिसोदिया राजवंश।
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माता-पिता: पिता महाराणा अरि सिंह II और माता राजमाता झाला जालिम सिंह की पुत्री।
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राज्याभिषेक: 1773 ई. में अपने पिता की हत्या के बाद मात्र 11 वर्ष की आयु में गद्दी पर बैठे।
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संरक्षक: कम उम्र होने के कारण इनकी माता राजमाता सरदार कुंवरी ने शासन की बागडोर संभाली।
2. शासनकाल की चुनौतियाँ और युद्ध (Conflicts & Instability)
हम्मीर सिंह II का काल युद्धों से अधिक ‘आंतरिक कलह’ का काल था:
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रत्नसिंह का विवाद: इनके समय में भी वह ‘फर्जी रत्नसिंह’ वाला विवाद चलता रहा। कई सामंत अभी भी हम्मीर को वैध राजा मानने को तैयार नहीं थे।
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मराठा और सिंधी सैनिकों का उत्पात: मेवाड़ की सेना में शामिल सिंधी और अरब सैनिकों ने वेतन न मिलने के कारण विद्रोह कर दिया था। वे उदयपुर की गलियों में खुलेआम लूटपाट करते थे।
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मेवाड़ का विभाजन: इस समय मेवाड़ के कई परगने मराठों और पड़ोसी रियासतों ने दबा लिए थे। सामंतों ने अपनी अलग सत्ता बना ली थी।
3. स्थापत्य और राजदरबार (Architecture & Court)
अत्यधिक गरीबी और अराजकता के कारण कोई नया भव्य निर्माण नहीं हुआ:
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सिटी पैलेस: उन्होंने उदयपुर के महलों में अपने रहने के लिए कुछ छोटे कमरों का निर्माण करवाया था।
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राजदरबार: दरबार में चूंडावत और शक्तावत सामंतों के बीच खूनी संघर्ष चलता रहता था। राजमाता ने इन सामंतों को नियंत्रित करने के लिए ‘अहीर’ और ‘सिंधी’ भाड़े के सैनिकों का सहारा लिया, जो बाद में और भी घातक सिद्ध हुआ।
4. कवि, लेखक और चित्रकला (Literature & Art)
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चित्रकला: इनके समय में मेवाड़ शैली की चित्रकला में गिरावट आने लगी थी। हालांकि, कुछ चित्रों में बालक हम्मीर सिंह को दरबार लगाते हुए और शिकार करते हुए दिखाया गया है।
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ऐतिहासिक स्रोत: इनके शासन की जानकारी मुख्य रूप से ‘वीर विनोद’ और ‘टॉड राजस्थान’ (James Tod) से मिलती है। कर्नल टॉड ने इनके शासनकाल को मेवाड़ के पतन की पराकाष्ठा बताया है।
5. सूक्ष्म बारीकियाँ (The Minute Details)
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वित्तीय कंगाली: कहा जाता है कि मेवाड़ की आर्थिक स्थिति इतनी खराब थी कि राजमहल के खर्चों के लिए गहने तक गिरवी रखने पड़े थे।
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मराठा दबाव: अहिल्याबाई होल्कर और सिंधिया के प्रतिनिधियों ने उदयपुर में अपना स्थायी डेरा डाल दिया था ताकि वे समय-समय पर पैसा वसूल सकें।
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मृत्यु (1778 ई.): मात्र 16 वर्ष की आयु में एक ‘बंदूक फटने’ की दुर्घटना या संदिग्ध बीमारी के कारण 1778 ई. में इनका देहांत हो गया। कुछ इतिहासकार इसे एक साजिश भी मानते हैं।
महाराणा हम्मीर सिंह II: एक नज़र में (Table)
| श्रेणी | विवरण |
| शासन काल | 1773 – 1778 ई.। |
| आयु | 11 वर्ष में गद्दी पर, 16 वर्ष में मृत्यु। |
| राजमाता (संरक्षक) | सरदार कुंवरी (इन्होंने शासन चलाया)। |
| मुख्य समस्या | आंतरिक गुटबाजी और मराठों का अत्यधिक कर्ज। |
| राजधानी | उदयपुर। |
| उत्तराधिकारी | महाराणा भीम सिंह (छोटे भाई)। |
निष्कर्ष:
महाराणा हम्मीर सिंह II का जीवन एक ऐसे दीये की तरह था जो आंधी में जलने की कोशिश कर रहा था। उनके पास न तो उम्र थी और न ही अनुभव कि वे मेवाड़ के उन शक्तिशाली और विद्रोही सामंतों को संभाल पाते जिन्होंने रियासत को दो टुकड़ों में बाँट दिया था।