महाराणा अरि सिंह II

महाराणा अरि सिंह II (शासनकाल: 1761–1773 ई.) मेवाड़ के इतिहास के सबसे विवादास्पद और अशांत काल के शासक माने जाते हैं। उनके शासनकाल में मेवाड़ ने वह दौर देखा जब गृहयुद्ध और बाहरी आक्रमणों (मराठों) ने रियासत की नींव हिला दी थी।

यहाँ महाराणा अरि सिंह II के बारे में हर छोटी से छोटी जानकारी दी गई है:


1. उत्पत्ति और पारिवारिक पृष्ठभूमि (Origin & Family)

  • वंश: सिसोदिया राजवंश।

  • माता-पिता: पिता महाराणा जगत सिंह II (ये राजसिंह II के चाचा थे)।

  • राज्याभिषेक: 1761 ई. में अपने भतीजे राजसिंह II की निःसंतान मृत्यु के बाद वे गद्दी पर बैठे।

  • स्वभाव: वे अत्यंत क्रोधी और हठी स्वभाव के थे, जिसके कारण मेवाड़ के अधिकांश सामंत उनके कट्टर शत्रु बन गए।

2. उत्तराधिकार का युद्ध और ‘रत्नसिंह’ का विवाद

अरि सिंह II के गद्दी पर बैठते ही मेवाड़ दो गुटों में बँट गया:

  • नकली रत्नसिंह: कुंभलगढ़ के सामंतों ने एक बालक को खड़ा किया और दावा किया कि यह स्वर्गवासी राजसिंह II का पुत्र ‘रत्नसिंह’ है।

  • गृहयुद्ध: मेवाड़ के प्रमुख सामंतों (जैसे चूंडावत) ने रत्नसिंह का पक्ष लिया, जबकि शक्तावत अरि सिंह के साथ रहे। इस आपसी लड़ाई ने मेवाड़ को खोखला कर दिया।

  • मराठा हस्तक्षेप: दोनों पक्षों ने मराठों (महादजी सिंधिया) को अपनी सहायता के लिए बुलाया, जिसके बदले मराठों ने मेवाड़ से 63 लाख रुपये की भारी राशि वसूली।


3. प्रमुख युद्ध (Wars)

  • उज्जैन का युद्ध (1769 ई.): अरि सिंह II की सेना और महादजी सिंधिया के बीच उज्जैन के पास भीषण युद्ध हुआ। इसमें मेवाड़ की सेना की हार हुई।

  • उदयपुर की घेराबंदी: सिंधिया ने उदयपुर को घेर लिया। अंत में एक भारी हर्जाना (खिराज) देने के वादे पर संधि हुई, जिसके कारण मेवाड़ के कई परगने (जैसे जावद, जीरण, नीमच) मराठों के पास चले गए।

4. स्थापत्य और राजदरबार (Architecture & Court)

इतनी अशांति के बावजूद, उन्होंने कुछ कलात्मक निर्माण करवाए:

  • अरि निवास: उदयपुर के सिटी पैलेस में इन्होंने अपने नाम पर ‘अरि निवास’ महलों का निर्माण करवाया।

  • चित्तौड़गढ़ में सुधार: उन्होंने चित्तौड़ के कुछ मंदिरों और सुरक्षा प्राचीरों की मरम्मत करवाई।

  • राजदरबार: उनके दरबार में फूट का बोलबाला था। उन्होंने अपने विरोधी सामंतों को कुचलने के लिए दमनकारी नीतियां अपनाईं, जिससे राजदरबार षड्यंत्रों का केंद्र बन गया।


5. कवि, लेखक और चित्रकला (Literature & Art)

  • चित्रकला: अरि सिंह II को चित्रकला का बहुत शौक था। उनके काल में भित्ति चित्रों (Frescoes) और हाथी की लड़ाइयों के चित्र बहुत बनाए गए। प्रसिद्ध चित्रकार जुग्न्नाथ और शिवदयाल ने उनके समय में काम किया।

  • ऐतिहासिक स्रोत: कविराज श्यामलदास ने ‘वीर विनोद’ में उनके क्रोधी स्वभाव को मेवाड़ के पतन का एक मुख्य कारण बताया है।

6. सूक्ष्म बारीकियाँ (The Minute Details)

  • धार्मिक कार्य: उन्होंने नाथद्वारा के श्रीनाथ जी मंदिर के लिए कई गाँवों का दान दिया ताकि मंदिर की व्यवस्था बनी रहे।

  • अजीत सिंह (बूंदी) से विवाद: अरि सिंह II का बूंदी के राव राजा अजीत सिंह के साथ शिकार के दौरान विवाद हो गया था।

  • मृत्यु (1773 ई.): 1773 में बूंदी के राव राजा अजीत सिंह ने शिकार के दौरान धोखे से अरि सिंह II की हत्या कर दी। यह घटना मेवाड़ के इतिहास में एक और काला अध्याय थी।


महाराणा अरि सिंह II: एक नज़र में (Table)

श्रेणी विवरण
शासन काल 1761 – 1773 ई.।
मुख्य प्रतिद्वंद्वी रत्नसिंह (फर्जी दावेदार) और महादजी सिंधिया।
स्वभाव क्रोधी और हठी (जिससे सामंतों में नाराजगी रही)।
बड़ा नुकसान जावद, नीमच और जीरण जैसे क्षेत्र मराठों के हाथ चले गए।
मृत्यु का कारण बूंदी के शासक द्वारा शिकार के दौरान हत्या।
उत्तराधिकारी महाराणा हम्मीर सिंह II।

निष्कर्ष:

महाराणा अरि सिंह II का शासनकाल मेवाड़ के लिए अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण रहा। उनके स्वभाव और आंतरिक कलह ने मराठों को मेवाड़ की राजनीति में पैर जमाने का पूरा मौका दे दिया, जिससे रियासत आर्थिक रूप से बर्बाद हो गई।

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