जालौर का युद्ध (1311 ईस्वी)

जालौर का युद्ध (1311 ईस्वी) खिलजी साम्राज्य के विस्तारवाद और राजपूत स्वाभिमान के बीच का एक और भीषण संघर्ष था। सिवाना की जीत के बाद, अलाउद्दीन खिलजी के लिए जालौर का रास्ता साफ हो गया था।

युद्ध का मुख्य विवरण

विवरण जानकारी
समय 1311 ईस्वी
स्थान सुवर्णगिरी दुर्ग (जालौर)
मुख्य पक्ष कान्हड़देव चौहान व कुंवर वीरमदेव ⚔️ अलाउद्दीन खिलजी
विश्वासघाती बीका दहिया (जिसने किले का गुप्त रास्ता बताया)
साहित्यिक स्रोत पद्मनाभ द्वारा रचित ‘कान्हड़देव प्रबंध’ और ‘वीरमदेव सोनगरारी बात’
परिणाम खिलजी की विजय और जालौर का नाम बदलकर ‘जलालाबाद’ किया गया

युद्ध की पृष्ठभूमि: फिरोजा और वीरमदेव की कथा

इतिहासकारों और ‘कान्हड़देव प्रबंध’ के अनुसार, इस युद्ध के पीछे एक दिलचस्प कारण बताया जाता है। खिलजी की पुत्री शहजादी फिरोजा, कान्हड़देव के पुत्र वीरमदेव से प्रेम करती थी और उससे विवाह करना चाहती थी। लेकिन वीरमदेव ने एक तुर्क राजकुमारी से विवाह करना अपने कुल के विरुद्ध माना और दिल्ली से जालौर लौट आए। इसे खिलजी ने अपना अपमान समझा और सेना भेज दी।


युद्ध का घटनाक्रम और विश्वासघात

  1. कठिन घेराबंदी: जालौर का किला अपनी मजबूती के लिए प्रसिद्ध था (कहा जाता है कि इसके द्वार आज तक कोई आक्रमणकारी नहीं खोल पाया)। खिलजी की सेना ने महीनों तक घेराबंदी की पर सफल नहीं हुए।

  2. दहिया राजपूत का धोखा: अलाउद्दीन ने बीका दहिया नामक सैनिक को लालच देकर अपनी ओर मिला लिया। बीका ने किले की दीवार के एक कमजोर हिस्से (जहाँ दीवार कच्ची थी) के बारे में बता दिया।

  3. बीका की पत्नी का साहस: जब बीका ने अपनी पत्नी हीरादे को इस गद्दारी के बारे में बताया, तो देशभक्त पत्नी ने अपने पति (बीका) का वध कर दिया और तुरंत इसकी सूचना राजा को देने दौड़ी, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।


जालौर का साका (1311)

  • जौहर: कान्हड़देव की रानी जैतलदे के नेतृत्व में सैकड़ों महिलाओं ने जौहर की ज्वाला में खुद को समर्पित कर दिया।

  • केसरिया: कान्हड़देव और उनके पुत्र वीरमदेव ने अंतिम सांस तक युद्ध किया। वीरमदेव ने अपनी कुलदेवी के सामने अपना सिर काटकर आत्मोत्सर्ग कर दिया।


महत्वपूर्ण परिणाम

  • मस्जिद का निर्माण: जीत के बाद अलाउद्दीन ने जालौर दुर्ग में एक मस्जिद बनवाई, जिसे आज भी ‘अलाउद्दीन की मस्जिद’ या ‘तोपखाना मस्जिद’ के नाम से जाना जाता है।

  • सोनगरा चौहानों का अंत: इस युद्ध के साथ जालौर में सोनगरा चौहानों का शासन समाप्त हो गया।

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