सारंगपुर का युद्ध (1437 ईस्वी) मेवाड़ के इतिहास का एक अत्यंत गौरवशाली युद्ध है, क्योंकि इसी विजय की स्मृति में चित्तौड़गढ़ का विश्वप्रसिद्ध ‘विजय स्तम्भ’ (Victory Tower) बनाया गया था। यह युद्ध मेवाड़ के महाराणा कुम्भा की सैन्य कुशलता का सबसे बड़ा प्रमाण है।
युद्ध का मुख्य विवरण
| विवरण | जानकारी |
| समय | 1437 ईस्वी |
| स्थान | सारंगपुर (मध्य प्रदेश) |
| मुख्य पक्ष | महाराणा कुम्भा (मेवाड़) ⚔️ महमूद खिलजी I (मालवा/माण्डू का सुल्तान) |
| परिणाम | महाराणा कुम्भा की निर्णायक विजय |
युद्ध के मुख्य कारण
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विद्रोहियों को शरण देना: मेवाड़ के महाराणा मोकल (कुम्भा के पिता) के हत्यारे— मपा पंवार और चाचा-मेरा के वंशजों को मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी ने शरण दी थी। कुम्भा के मांगने पर सुल्तान ने उन्हें सौंपने से मना कर दिया।
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साम्राज्य विस्तार: कुम्भा अपने राज्य की सीमाओं को सुरक्षित करना चाहते थे, जबकि मालवा का सुल्तान मेवाड़ पर अपना प्रभाव जमाना चाहता था।
युद्ध का घटनाक्रम और कुम्भा का पराक्रम
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महाराणा कुम्भा ने एक विशाल सेना के साथ मालवा पर आक्रमण किया और सारंगपुर के मैदान में सुल्तान की सेना को बुरी तरह परास्त किया।
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सुल्तान महमूद खिलजी अपनी जान बचाकर माण्डू के किले में छिप गया, लेकिन कुम्भा ने किले की घेराबंदी कर उसे बंदी बना लिया।
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उदारता: महाराणा कुम्भा ने सुल्तान को लगभग 6 महीने तक चित्तौड़ में बंदी बनाकर रखा, लेकिन बाद में एक सच्चे राजपूत योद्धा की तरह उसे रिहा कर दिया। हालांकि, इतिहासकारों के अनुसार यह कुम्भा की एक राजनीतिक भूल भी मानी जाती है।
विजय का प्रतीक: विजय स्तम्भ (Victory Tower)
इस महान विजय की खुशी में महाराणा कुम्भा ने चित्तौड़गढ़ दुर्ग में ‘विजय स्तम्भ’ का निर्माण करवाया। इसके बारे में कुछ विशेष तथ्य:
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ऊंचाई: 122 फीट (9 मंजिला इमारत)।
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वास्तुकार: जैता और उसके पुत्र (नापा, पोमा, पुंजा)।
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नाम: इसे ‘भारतीय मूर्तिकला का विश्वकोश’ और ‘विष्णु ध्वज’ भी कहा जाता है।
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समर्पण: यह भगवान विष्णु को समर्पित है।
अन्य महत्वपूर्ण परिणाम
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इस जीत के बाद महाराणा कुम्भा को ‘हिंदू सुरत्राण’ और ‘अभिनव भरताचार्य’ जैसी उपाधियों से नवाजा गया।
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मेवाड़ की धाक पूरे उत्तर भारत में जम गई और कुम्भा एक अजेय योद्धा के रूप में उभरे।