कायदरा का युद्ध (1178 ईस्वी)

कायदरा का युद्ध (1178 ईस्वी) राजस्थान के इतिहास का वह गौरवशाली अध्याय है, जिसने विदेशी आक्रांताओं के मन में राजपूतों का खौफ पैदा कर दिया था। यह युद्ध माउंट आबू की तलहटी में स्थित कायदरा (सिरोही) नामक स्थान पर लड़ा गया था।

यहाँ इस युद्ध का विस्तृत विवरण और महत्व दिया गया है:

युद्ध का मुख्य विवरण

विवरण जानकारी
समय 1178 ईस्वी
स्थान कायदरा गांव, आबू पर्वत के पास (सिरोही, राजस्थान)
मुख्य पक्ष गुजरात के चालुक्य शासक मूलराज II (सेनापति: उनकी माता नायिका देवी) ⚔️ मोहम्मद गोरी
परिणाम राजपूतों की निर्णायक विजय, मोहम्मद गोरी की शर्मनाक हार

युद्ध का संक्षिप्त परिचय और घटनाएं

  1. गोरी की योजना: मोहम्मद गोरी ने भारत विजय के लिए इस बार पंजाब के बजाय गुजरात (अनहिलवाड़ा) के रास्ते आक्रमण करने की सोची। उसे लगा कि एक छोटे बालक (मूलराज II) का शासन होने के कारण गुजरात को जीतना आसान होगा।

  2. नायिका देवी का शौर्य: मूलराज II उस समय अल्पायु थे, इसलिए उनकी माता नायिका देवी (जो गोवा के कदम्ब राजा की पुत्री थीं) ने युद्ध का नेतृत्व संभाला। उन्होंने पहाड़ी भौगोलिक स्थिति का फायदा उठाने के लिए कायदरा के ऊबड़-खाबड़ रास्तों को चुना।

  3. भीषण संघर्ष: गोरी की सेना को आबू की पहाड़ियों में घेर लिया गया। नायिका देवी ने अपने पुत्र को पीठ पर बांधकर युद्ध का नेतृत्व किया और गोरी की सेना को गाजर-मूली की तरह काट दिया।

  4. गोरी का पलायन: कहा जाता है कि मोहम्मद गोरी इस युद्ध में इतनी बुरी तरह घायल हुआ और डरा कि वह अपनी जान बचाकर मरुस्थल के रास्ते वापस भाग गया।

इस युद्ध का ऐतिहासिक महत्व

  • गोरी की पहली बड़ी हार: यह भारत में मोहम्मद गोरी की पहली सबसे बड़ी और करारी हार थी।

  • रणनीति का बदलाव: इस हार के बाद गोरी ने अगले 13-14 सालों तक गुजरात की ओर मुड़कर भी नहीं देखा और अपना मार्ग बदलकर पंजाब (तराइन) के रास्ते दिल्ली पर हमला करने की योजना बनाई।

  • महिला शक्ति का प्रतीक: नायिका देवी के पराक्रम ने यह सिद्ध कर दिया कि भारतीय वीरांगनाएं युद्ध कौशल में किसी भी पुरुष योद्धा से कम नहीं थीं।

विशेष नोट: इतिहास की कई किताबों में इसे ‘आबू का युद्ध’ या ‘कसाद्रद का युद्ध’ भी कहा जाता है। यह युद्ध भारतीय प्रतिरोध की एक ऐसी मिसाल है जिसे अक्सर मुख्यधारा के इतिहास में उतनी जगह नहीं मिली जितनी तराइन के युद्ध को मिली।

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