महाराव भीमसिंह (शासनकाल: 1707–1720 ई.) कोटा के छठे और सबसे प्रतापी शासकों में से एक थे। वे राव रामसिंह के पुत्र थे। उनके काल को कोटा के इतिहास का ‘स्वर्ण युग’ माना जाता है क्योंकि उन्होंने ही कोटा को एक शक्तिशाली स्वतंत्र रियासत के रूप में स्थापित किया।
महाराव भीमसिंह के बारे में विस्तृत विवरण यहाँ दिया गया है:
1. ‘महाराव’ की उपाधि और स्वतंत्रता
भीमसिंह कोटा के पहले शासक थे जिन्होंने ‘महाराव’ की उपाधि धारण की।
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मुगल संबंध: औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुगल सत्ता कमजोर हो गई थी। भीमसिंह ने अपनी कूटनीति और वीरता से मुगल दरबार में इतना ऊंचा स्थान प्राप्त किया कि उन्हें ‘महाराव’ का पद मिला।
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विस्तार: उन्होंने बूंदी पर आक्रमण किया और कुछ समय के लिए उसे भी कोटा के अधीन कर लिया था। उन्होंने ‘पाटन’ और कई अन्य परगनों को जीतकर कोटा राज्य की सीमाओं का विस्तार किया।
2. कृष्ण भक्ति और ‘नंदग्राम’ (Religious Shift)
महाराव भीमसिंह भगवान कृष्ण के अनन्य भक्त थे। वे वल्लभ संप्रदाय के अनुयायी थे:
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नाम परिवर्तन: अपनी भक्ति के कारण उन्होंने कोटा का नाम बदलकर ‘नंदग्राम’ और शेरगढ़ का नाम ‘बरसाणा’ रख दिया था।
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राजकीय मोहर: उन्होंने राज्य की मोहर पर “श्री ब्रजराज की दुहाई” लिखवाया। वे स्वयं को भगवान कृष्ण का दीवान मानकर शासन करते थे।
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ब्रजनाथ जी का मंदिर: उन्होंने कोटा के गढ़ में ब्रजनाथ जी का भव्य मंदिर बनवाया और उन्हीं को राज्य का वास्तविक स्वामी घोषित किया।
3. युद्ध और सैन्य उपलब्धियाँ
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फर्रुखसियर का साथ: उन्होंने मुगल सम्राट फर्रुखसियर का साथ दिया और कई विद्रोहों को दबाया।
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बूंदी से संघर्ष: उन्होंने बूंदी के राव बुद्धसिंह को पराजित किया और बूंदी का राजकीय वैभव (जैसे नगाड़े और झंडे) कोटा ले आए।
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अंतिम युद्ध: 1720 ई. में मुगलों के आंतरिक संघर्ष के दौरान वे एक युद्ध में लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।
4. कला, साहित्य और राजदरबार
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कोटा चित्रकला शैली: भीमसिंह का काल कोटा शैली के लिए क्रांतिकारी रहा। उनके समय में कृष्ण लीलाओं और धार्मिक विषयों पर आधारित चित्रों का निर्माण प्रचुर मात्रा में हुआ।
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लेखक और कवि: उनके दरबार में ब्रज भाषा के कवियों का जमघट लगा रहता था। वे स्वयं विद्वानों के बड़े कद्रदान थे।
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निर्माण: उन्होंने कोटा के किलों और प्राचीरों को और अधिक मजबूत करवाया।
5. ऐतिहासिक स्रोत (Sources)
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वंश भास्कर: सूर्यमल मिश्रण ने भीमसिंह की वीरता और उनकी कृष्ण भक्ति का बहुत ही विस्तार से वर्णन किया है।
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कोटा राज्य की ख्यात: इन ख्यातों में उनके द्वारा किए गए प्रशासनिक सुधारों और कोटा को एक शक्तिशाली आर्थिक केंद्र बनाने के प्रयासों का उल्लेख है।
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गौरीशंकर हीराचंद ओझा: ओझा जी ने भीमसिंह को “कोटा का सबसे प्रतापी और साहसी शासक” माना है जिसने कोटा की वास्तविक स्वतंत्र सत्ता की नींव रखी।
महाराव भीमसिंह – मुख्य तथ्य (Table)
| श्रेणी | विवरण |
| विशेषता | ‘महाराव’ की उपाधि धारण करने वाले प्रथम शासक। |
| भक्ति मार्ग | वल्लभ संप्रदाय (कृष्ण भक्ति) के अनुयायी। |
| राजनीतिक केंद्र | कोटा (नंदग्राम)। |
| ऐतिहासिक योगदान | बूंदी से स्वतंत्र होकर कोटा को राजस्थान की एक प्रमुख शक्ति बनाया। |
निष्कर्ष:
महाराव भीमसिंह एक ऐसे शासक थे जिन्होंने तलवार के बल पर राज्य जीता और भक्ति के बल पर प्रजा का दिल। उनके समय में ही कोटा का वह सांस्कृतिक स्वरूप निखरा जो आज भी वहाँ के मंदिरों और उत्सवों में दिखाई देता है।