कोटा के चौहानों का इतिहास राजस्थान के हाड़ौती क्षेत्र के शौर्य और वैभव की कहानी है। यहाँ के चौहानों को ‘हाड़ा चौहान’ कहा जाता है। कोटा मूल रूप से बूंदी रियासत का ही एक हिस्सा था, जो बाद में एक स्वतंत्र रियासत के रूप में उभरा।
यहाँ कोटा के चौहानों का सामान्य परिचय दिया गया है:
1. हाड़ा चौहानों का मूल (Origin)
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वंश: ये नाडोल के चौहानों की एक शाखा हैं।
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नाम ‘हाड़ा’ क्यों? इस वंश के एक प्रतापी पूर्वज राव हाड़ा (अस्थिपाल) के नाम पर यह शाखा ‘हाड़ा’ कहलाई।
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क्षेत्र: चम्बल नदी के आस-पास का क्षेत्र जहाँ इनका शासन रहा, उसे ‘हाड़ौती’ कहा जाता है।
2. कोटा रियासत की स्थापना (1631 ई.)
कोटा पहले बूंदी के अधीन था और यहाँ ‘कोटिया भील’ का शासन था।
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विजेता: बूंदी के राव देवा के वंशज जैतसिंह ने कोटिया भील को हराकर इस क्षेत्र पर अधिकार किया था।
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स्वतंत्र रियासत: मुगल सम्राट शाहजहाँ ने 1631 ई. में बूंदी से अलग कर कोटा को एक स्वतंत्र रियासत की मान्यता दी।
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प्रथम स्वतंत्र शासक: राव माधोसिंह (बूंदी के राव रतनसिंह के पुत्र) कोटा के पहले स्वतंत्र शासक बने।
3. प्रमुख शासक और उपलब्धियाँ
| शासक का नाम | मुख्य विवरण / उपलब्धि |
| राव माधोसिंह | कोटा रियासत के संस्थापक। शाहजहाँ ने इनकी वीरता से प्रसन्न होकर इन्हें कोटा प्रदान किया। |
| राव मुकुंदसिंह | इन्होंने अबली मीणी का महल बनवाया। मुगलों के उत्तराधिकार युद्ध (धर्मत का युद्ध) में वीरता से लड़ते हुए वीरगति पाई। |
| राव भीमसिंह | ये कृष्ण भक्त थे और इन्होंने कोटा का नाम बदलकर ‘नंदग्राम’ कर दिया था। ये ‘महाराव’ की उपाधि धारण करने वाले पहले शासक थे। |
| महाराव दुर्जनसाल | इनके समय मेवाड़, मारवाड़ और कोटा की संयुक्त सेनाओं ने मुगलों और मराठों के प्रभाव को रोकने का प्रयास किया। |
| महाराव उम्मेदसिंह | इनके समय में झाला जालिम सिंह (प्रसिद्ध कूटनीतिज्ञ) का प्रभाव बढ़ा। 1817 में अंग्रेजों से संधि की। |
4. झाला जालिम सिंह: कोटा का ‘मुसाहिब-आला’
कोटा के इतिहास में झाला जालिम सिंह का नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है।
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वे कोटा के सेनापति और प्रधानमंत्री थे।
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उन्होंने अपनी कूटनीति से कोटा को मराठों और पिंडारियों के लूटपाट से सुरक्षित रखा।
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कोटा की वास्तविक शक्ति लंबे समय तक इन्हीं के हाथों में रही।
5. कला और संस्कृति
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कोटा शैली (चित्रकला): कोटा अपनी चित्रकला शैली के लिए विश्व प्रसिद्ध है। यहाँ के चित्रों में ‘शिकार के दृश्य’ मुख्य विशेषता हैं। यहाँ तक कि रानियों और नारियों को भी शिकार करते हुए दिखाया गया है।
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कोटा डोरिया: यहाँ की प्रसिद्ध बुनाई कला (साड़ियाँ) जो अपनी सुष्मता के लिए जानी जाती है।
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स्थापत्य: कोटा का सिटी पैलेस (गढ़), जगमंदिर (किशोर सागर झील के बीच) और मुकुंदरा की पहाड़ियाँ दर्शनीय हैं।
6. ऐतिहासिक महत्व
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चम्बल नदी: कोटा चम्बल नदी के तट पर स्थित एकमात्र ऐसी रियासत थी जिसके पास बारहमासी जल का स्रोत था।
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वीरता: कोटा के हाड़ा चौहानों ने मुगलों के कई कठिन अभियानों (जैसे कंधार और दक्षिण भारत) में अपनी वीरता का लोहा मनवाया था।
कोटा के चौहानों ने अपनी वीरता के साथ-साथ प्रशासनिक कुशलता और कलात्मक अभिरुचि से राजस्थान के इतिहास को समृद्ध किया है।
कोटा के हाड़ा चौहानों का इतिहास 1631 ई. से शुरू होकर भारत की स्वतंत्रता तक रहा। इस दौरान कोटा ने कई शक्तिशाली और कला-प्रेमी शासक दिए।
यहाँ कोटा के प्रमुख शासकों की कालक्रमानुसार सूची दी गई है:
कोटा के हाड़ा शासकों की वंशावली (1631–1948 ई.)
| क्रम | राजा का नाम | शासन काल (ई.) | मुख्य विवरण / उपलब्धि |
| 1 | राव माधोसिंह | 1631 – 1648 ई. | कोटा रियासत के संस्थापक। शाहजहाँ ने इन्हें स्वतंत्र शासक बनाया। |
| 2 | राव मुकुंदसिंह | 1648 – 1658 ई. | ‘अबली मीणी का महल’ बनवाया। धर्मत के युद्ध में लड़ते हुए वीरगति पाई। |
| 3 | राव जगतसिंह | 1658 – 1683 ई. | औरंगजेब के समय दक्षिण अभियानों में सक्रिय रहे। |
| 4 | राव किशोरसिंह | 1684 – 1696 ई. | मुगलों के विभिन्न सैन्य अभियानों में वीरता दिखाई। |
| 5 | राव रामसिंह | 1696 – 1707 ई. | जजाऊ के युद्ध में आजम शाह की ओर से लड़ते हुए मारे गए। |
| 6 | महाराव भीमसिंह | 1707 – 1720 ई. | ‘महाराव’ की उपाधि धारण करने वाले पहले शासक। कोटा का नाम ‘नंदग्राम’ रखा। |
| 7 | महाराव दुर्जनसाल | 1723 – 1756 ई. | इनके समय कोटा ने मराठों के खिलाफ अपनी स्थिति मजबूत की। |
| 8 | महाराव गुमानसिंह | 1764 – 1771 ई. | इन्होंने झाला जालिम सिंह को कोटा का फौजदार नियुक्त किया। |
| 9 | महाराव उम्मेदसिंह I | 1771 – 1819 ई. | इनके समय वास्तविक शक्ति झाला जालिम सिंह के पास थी। 1817 में अंग्रेजों से संधि की। |
| 10 | महाराव किशोरसिंह II | 1819 – 1828 ई. | झाला जालिम सिंह के साथ इनका ‘मांगरोल का युद्ध’ (1821) प्रसिद्ध है। |
| 11 | महाराव रामसिंह II | 1828 – 1866 ई. | इनके समय 1857 की क्रांति हुई, जिसमें कोटा के क्रांतिकारियों ने इन्हें नजरबंद कर दिया था। |
| 12 | महाराव उम्मेदसिंह II | 1889 – 1940 ई. | आधुनिक कोटा के निर्माता। हर्बर्ट कॉलेज और उम्मेद भवन का निर्माण करवाया। |
| 13 | महाराव भीमसिंह II | 1940 – 1948 ई. | अंतिम शासक। राजस्थान संघ के राजप्रमुख बने। |
इतिहास के कुछ महत्वपूर्ण मोड़
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धर्मत का युद्ध (1658): राव मुकुंदसिंह और उनके चार भाई औरंगजेब के खिलाफ दारा शिकोह की ओर से लड़ते हुए शहीद हुए थे।
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झाला जालिम सिंह का प्रभाव: उम्मेदसिंह प्रथम के समय से ही कोटा की सत्ता में ‘झाला’ परिवार का हस्तक्षेप बढ़ गया था, जिससे अंततः 1838 में झालावाड़ नाम की एक नई रियासत का जन्म हुआ।
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1857 की क्रांति: कोटा राजस्थान का वह केंद्र था जहाँ सबसे भीषण और सुनियोजित जन-विद्रोह हुआ। यहाँ के क्रांतिकारियों ने पॉलिटिकल एजेंट बर्टन का सिर काटकर शहर में घुमाया था।
विशेष तथ्य:
कोटा के शासकों के नाम के साथ ‘महाराव’ की उपाधि का प्रयोग भीमसिंह प्रथम के समय से शुरू हुआ था, जो उनके भगवान कृष्ण (बृजराज) के प्रति अनन्य भक्ति और दिल्ली दरबार में उनके बढ़ते कद को दर्शाता था।