कन्नौज के राजा जयचंद गहड़वाल भारतीय इतिहास के सबसे चर्चित और विवादास्पद शासकों में से एक हैं। राजस्थान के इतिहास से उनका सीधा संबंध नहीं था, लेकिन राजस्थान के सबसे शक्तिशाली ‘राठौड़ वंश‘ की जड़ें उन्हीं से जुड़ी मानी जाती हैं।
यहाँ जयचंद गहड़वाल और उनके राजस्थान कनेक्शन का विस्तृत विवरण है:
1. जयचंद कौन था? (परिचय)
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वंश: गहड़वाल वंश (उत्तर प्रदेश के कन्नौज और वाराणसी का शासक)।
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पिता: राजा विजयचंद्र।
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राजधानी: कन्नौज (उस समय भारत का सबसे समृद्ध शहर)।
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उपाधि: उसे ‘दलों पंगुल’ कहा जाता था, क्योंकि उसकी सेना इतनी विशाल थी कि जब वह चलती थी तो माना जाता था कि सेना के बोझ से धरती “पंगु” (लंगड़ी) हो जाती थी।
2. राजस्थान से संबंध (The Rathore Connection)
जयचंद का राजस्थान से मुख्य संबंध वंशावली के माध्यम से है:
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राठौड़ों के पूर्वज: राजस्थान की ख्यातों (जैसे मुहणौत नैणसी री ख्यात) और मारवाड़ के इतिहास के अनुसार, जोधपुर के राठौड़ शासक स्वयं को जयचंद गहड़वाल का वंशज मानते हैं।
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स्थानांतरण: 1194 ईस्वी में चंदावर के युद्ध में जयचंद की मृत्यु के बाद, उसका पोता (या वंशज) राव सीहा कन्नौज छोड़कर राजस्थान (पाली) आ गया था। यहीं से मारवाड़ के राठौड़ साम्राज्य की नींव पड़ी।
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विवाद: हालांकि कुछ आधुनिक इतिहासकार गहड़वाल और राठौड़ को अलग मानते हैं, लेकिन राजस्थान की सांस्कृतिक और पारंपरिक मान्यताओं में जयचंद को राठौड़ों का मूल पुरुष माना जाता है।
3. पृथ्वीराज चौहान और जयचंद (दिल्ली-अजमेर संघर्ष)
जयचंद का राजस्थान के एक और महान शासक अजमेर के पृथ्वीराज चौहान के साथ गहरा संघर्ष था:
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प्रतिद्वंद्विता: दोनों उत्तर भारत पर अपना वर्चस्व चाहते थे। जयचंद का मानना था कि दिल्ली पर उसका अधिकार होना चाहिए।
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संयोगिता हरण: सबसे प्रसिद्ध किस्सा जयचंद की पुत्री संयोगिता और पृथ्वीराज का है। जयचंद ने ‘राजसूय यज्ञ’ और संयोगिता का ‘स्वयंवर’ रखा था, जिसमें पृथ्वीराज को अपमानित करने के लिए उनकी प्रतिमा द्वारपाल के रूप में लगाई गई। पृथ्वीराज वहां से संयोगिता को ले गए, जिससे दोनों के बीच दुश्मनी चरम पर पहुँच गई।
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परिणाम: इस आपसी फूट के कारण ही राजपूतों की शक्ति कमजोर हुई, जिसका लाभ मोहम्मद गौरी को मिला।
4. चंदावर का युद्ध (1194 ईस्वी) और अंत
तराइन के दूसरे युद्ध (1192) में पृथ्वीराज की हार के बाद, मोहम्मद गौरी ने कन्नौज पर हमला किया।
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युद्ध: इटावा के पास चंदावर नामक स्थान पर जयचंद और गौरी के बीच युद्ध हुआ।
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मृत्यु: ऐसा कहा जाता है कि जयचंद एक हाथी पर सवार था और एक तीर उसकी आँख में लगा, जिससे उसकी मृत्यु हो गई। उसकी मृत्यु के साथ ही कन्नौज का गहड़वाल साम्राज्य समाप्त हो गया।
5. जयचंद के नाम से जुड़ी भ्रांति (जयचंद यानी गद्दार?)
भारतीय जनश्रुतियों में जयचंद का नाम ‘गद्दार’ के रूप में रूढ़ हो गया है। कहा जाता है कि उसने गौरी को भारत आने का न्यौता दिया था।
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ऐतिहासिक तथ्य: समकालीन मुस्लिम इतिहासकारों या शिलालेखों में इस बात का कोई पुख्ता सबूत नहीं मिलता कि जयचंद ने गौरी को बुलाया था।
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वास्तविकता: जयचंद खुद गौरी से लड़ते हुए मारा गया था। वह एक वीर योद्धा और कला का संरक्षक भी था। प्रसिद्ध कवि श्रीहर्ष (नैषधीयचरित के लेखक) उनके दरबारी कवि थे।
निष्कर्ष
राजस्थान के लिए जयचंद का महत्व इसलिए है क्योंकि:
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वह पृथ्वीराज चौहान का सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी था।
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वह मारवाड़ के राठौड़ वंश का मूल स्रोत माना जाता है।
यदि आप मारवाड़ का इतिहास (राव सीहा से शुरू होने वाला) MS Word में लिख रहे हैं, तो जयचंद को “राठौड़ों का कन्नौज मूल का पूर्वज” के रूप में उल्लेख करना सबसे सही रहेगा।