महाराणा संग्राम सिंह II (शासनकाल: 1710–1734 ई.) मेवाड़ के उन कुशल प्रशासकों में से थे जिन्होंने औरंगज़ेब के बाद की अराजकता के दौर में मेवाड़ को आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से सुदृढ़ बनाया। उनके शासनकाल को मेवाड़ के ‘पुनर्जागरण और निर्माण का काल’ कहा जाता है। वे महाराणा सांगा (संग्राम सिंह प्रथम) के नाम पर ही संग्राम सिंह द्वितीय कहलाए।
यहाँ महाराणा संग्राम सिंह II के बारे में हर बारीक जानकारी दी गई है:
1. उत्पत्ति और पारिवारिक पृष्ठभूमि (Origin & Family)
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वंश: सिसोदिया राजवंश।
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माता-पिता: पिता महाराणा अमर सिंह II।
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स्वभाव: वे अपने उदार स्वभाव, न्यायप्रियता और प्रशासनिक अनुशासन के लिए प्रसिद्ध थे।
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पुत्र: उनके उत्तराधिकारी महाराणा जगत सिंह II थे (जिन्होंने हुरड़ा सम्मेलन की अध्यक्षता की थी)।
2. सैन्य विजय और कूटनीति (Wars & Diplomacy)
संग्राम सिंह II ने मेवाड़ की सीमाओं को सुरक्षित रखने के लिए कई सफल सैन्य अभियान किए:
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बंदवाड़ का युद्ध (1711 ई.): इन्होंने मुगल सेनापति रणबाज खाँ को बुरी तरह पराजित किया। यह उनकी सबसे महत्वपूर्ण सैन्य विजय मानी जाती है।
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पड़ोसी राज्यों पर प्रभाव: उन्होंने ईडर, डूंगरपुर और बांसवाड़ा के शासकों पर मेवाड़ का प्रभुत्व पुनः स्थापित किया।
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मुगल संबंध: इन्होंने मुगल सम्राट फर्रुखसियर से मधुर संबंध बनाए रखे ताकि मेवाड़ को शांतिपूर्ण विकास का समय मिल सके। हालांकि, इन्होंने मालवा और गुजरात के क्षेत्रों में मेवाड़ का प्रभाव बढ़ाने के लिए कूटनीतिक दबाव हमेशा बनाए रखा।
3. स्थापत्य: सहेलियों की बाड़ी (Architecture)
महाराणा संग्राम सिंह II को उनके कलात्मक निर्माणों के लिए विश्वभर में जाना जाता है:
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सहेलियों की बाड़ी (उदयपुर): यह उदयपुर का सबसे सुंदर पर्यटन स्थल है। महाराणा ने अपनी रानी और उनकी सहेलियों के मनोरंजन के लिए इस ‘फव्वारों के बगीचे’ का निर्माण करवाया था। इसमें इंग्लैंड से मंगवाए गए फव्वारे और संगमरमर के हाथी आकर्षण का केंद्र हैं।
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सीताराम जी का मंदिर: उदयपुर में इन्होंने भगवान राम और सीता का भव्य मंदिर बनवाया।
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बैद्यनाथ मंदिर (सीसारमा): इन्होंने उदयपुर के पास सीसारमा गाँव में प्रसिद्ध बैद्यनाथ (शिव) मंदिर का निर्माण करवाया।
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महल निर्माण: इन्होंने सिटी पैलेस के भीतर कई छोटे महलों और भित्ति चित्रों (Frescoes) का विस्तार किया।
4. राजदरबार, कवि और लेखक (Court & Intellectuals)
उनके दरबार में विद्वानों और इतिहासकारों का विशेष सम्मान था:
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बैद्यनाथ प्रशस्ति: इस प्रसिद्ध शिलालेख की रचना इनके समय में हुई, जो सीसारमा के मंदिर में स्थित है। इसमें मेवाड़ के इतिहास और संग्राम सिंह की विजयों का वर्णन है।
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साहित्यिक संरक्षण: इनके समय में ‘नल-दमयंती’ कथा और कई धार्मिक ग्रंथों का राजस्थानी और संस्कृत में अनुवाद हुआ।
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चित्रकला: इनके काल में मेवाड़ शैली की चित्रकला में ‘दरबारी दृश्यों’ और ‘उत्सवों’ के चित्रण की प्रधानता रही। चित्रकार पन्ना और चोखा जैसे कलाकारों ने इनके समय में काम शुरू किया था।
5. सूक्ष्म बारीकियाँ (The Minute Details)
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न्याय व्यवस्था: उन्हें मेवाड़ के सबसे न्यायप्रिय राजाओं में गिना जाता है। कहा जाता है कि उनके समय में अपराध दर न्यूनतम थी।
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अकाल राहत: उन्होंने अपने शासन के दौरान पड़े अकालों में जनता के लिए अनाज के भंडार खोल दिए थे और कई जलाशयों का निर्माण करवाया।
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मुगल दरबार में सम्मान: मुगल बादशाह ने उन्हें ‘7000 का मनसब’ प्रदान किया था, जो मेवाड़ के महाराणाओं के लिए एक बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि थी।
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मराठा शक्ति का उदय: इनके शासनकाल के अंतिम वर्षों में राजस्थान में मराठों का हस्तक्षेप शुरू हो गया था। उन्होंने मराठों के विरुद्ध एक संयुक्त राजपूताना मोर्चा बनाने की योजना पर काम शुरू किया था, जिसे उनके पुत्र ने आगे बढ़ाया।
6. मृत्यु (11 जनवरी 1734)
महाराणा संग्राम सिंह II का देहांत 1734 ई. में हुआ। उनकी मृत्यु के साथ ही मेवाड़ का वह युग समाप्त हो गया जहाँ मेवाड़ आंतरिक रूप से अत्यधिक समृद्ध और शक्तिशाली था।
महाराणा संग्राम सिंह II: एक नज़र में (Table)
| श्रेणी | विवरण |
| शासन काल | 1710 – 1734 ई.। |
| मुख्य निर्माण | सहेलियों की बाड़ी (उदयपुर)। |
| प्रसिद्ध युद्ध | बंदवाड़ का युद्ध (रणबाज खाँ के विरुद्ध)। |
| शिलालेख | बैद्यनाथ प्रशस्ति। |
| विशेषता | न्यायप्रियता और कुशल राजस्व प्रबंधन। |
| उत्तराधिकारी | महाराणा जगत सिंह II। |
निष्कर्ष:
महाराणा संग्राम सिंह II ने मेवाड़ को वह शांति और धन प्रदान किया जिससे कला और संस्कृति फली-फूली। ‘सहेलियों की बाड़ी’ आज भी उनकी सुरुचिपूर्ण दृष्टि का जीवंत प्रमाण है।