रावल सामंत सिंह (शासनकाल: 1172–1179 ई.) मेवाड़ के गुहिल वंश की रावल शाखा के एक अत्यंत वीर, किंतु संघर्षशील शासक थे। उनका जीवन वीरता, पारिवारिक संबंधों और राजनीतिक उथल-पुथल का एक संगम है। इतिहास में उन्हें मेवाड़ खोने और फिर वागड़ (डूंगरपुर) में नए राज्य की नींव रखने के लिए जाना जाता है।
यहाँ रावल सामंत सिंह के बारे में हर छोटी से छोटी जानकारी दी गई है:
1. उत्पत्ति और पारिवारिक पृष्ठभूमि (Origin & Family)
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वंश: गुहिल राजवंश (रावल शाखा)।
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पिता: महारावल क्षेम सिंह। (रण सिंह के ज्येष्ठ पुत्र)।
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भाई: कुमार सिंह (जिन्होंने बाद में मेवाड़ को पुनः प्राप्त किया)।
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वैवाहिक संबंध: सामंत सिंह का विवाह अजमेर के चौहान सम्राट पृथ्वीराज चौहान III की बहन पृथ्वीबाई से हुआ था। इस संबंध ने मेवाड़ और अजमेर के बीच एक मजबूत सैन्य और राजनीतिक गठबंधन बनाया।
2. मेवाड़ का खोना और कीर्तिपाल चौहान का आक्रमण
सामंत सिंह के शासनकाल की सबसे बड़ी घटना मेवाड़ पर बाहरी आक्रमण और राज्य का हाथ से निकलना था:
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कीर्तिपाल (कीतू) चौहान: जालौर के चौहान शासक कीर्तिपाल ने मेवाड़ पर आक्रमण किया।
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हार का कारण: सामंत सिंह एक वीर योद्धा थे, लेकिन जालौर की सेना और आंतरिक सामंती असंतोष के कारण 1177-79 ई. के आसपास उन्हें मेवाड़ छोड़ना पड़ा।
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विस्थापन: मेवाड़ छोड़ने के बाद उन्होंने अरावली के दक्षिण में ‘वागड़’ प्रदेश की ओर प्रस्थान किया।
3. वागड़ राज्य (डूंगरपुर) की स्थापना
मेवाड़ खोने के बाद सामंत सिंह ने अपनी हार को अंत नहीं माना:
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डूंगरपुर की नींव: 1178-79 ई. के आसपास उन्होंने वागड़ के स्थानीय भील सरदारों और चावड़ा राजपूतों को पराजित कर डूंगरपुर (वागड़) में गुहिल वंश की एक नई शाखा स्थापित की।
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सांस्कृतिक प्रभाव: उन्होंने वागड़ क्षेत्र में राजपूती शासन पद्धति और मेवाड़ी संस्कृति का समावेश किया।
4. तराइन का युद्ध और वीरगति (1192 ई.)
सामंत सिंह का अंत भारतीय इतिहास के सबसे निर्णायक युद्धों में से एक में हुआ:
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पृथ्वीराज का साथ: जब मोहम्मद गोरी ने भारत पर आक्रमण किया, तो सामंत सिंह अपने साले पृथ्वीराज चौहान की सहायता के लिए अपनी सेना लेकर पहुँचे।
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वीरगति: तराइन के द्वितीय युद्ध (1192 ई.) में गोरी की सेना के विरुद्ध लड़ते हुए सामंत सिंह वीरगति को प्राप्त हुए। उनकी रानी पृथ्वीबाई उनके साथ सती हुई थीं।
5. स्थापत्य और निर्माण परियोजनाएँ (Architecture)
सामंत सिंह का समय निरंतर युद्धों और विस्थापन का था, इसलिए भव्य निर्माण के अवसर कम मिले, फिर भी:
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सैन्य चौकियाँ: उन्होंने वागड़ में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए छोटी गढ़ियों और सुरक्षा चौकियों का निर्माण करवाया।
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धार्मिक झुकाव: वे शैव मतानुयायी थे। उनके समय के कुछ शिलालेखों में मंदिरों को दिए गए दान का उल्लेख मिलता है।
6. राजदरबार, कवि और लेखक (Court & Sources)
सामंत सिंह के काल की जानकारी के लिए निम्नलिखित स्रोत अत्यंत महत्वपूर्ण हैं:
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माउंट आबू (अचलेश्वर) शिलालेख: 1179 ई. के इस शिलालेख में सामंत सिंह को ‘मेवाड़ का शासक’ बताया गया है, जो उनके शासन के प्रारंभिक वर्षों की पुष्टि करता है।
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पृथ्वीराज रासो: चंदबरदाई द्वारा रचित इस महाकाव्य में सामंत सिंह की वीरता और पृथ्वीराज के साथ उनके घनिष्ठ संबंधों का विस्तृत वर्णन है।
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नैणसी री ख्यात: मुँहणोत नैणसी ने डूंगरपुर राज्य की स्थापना के संदर्भ में सामंत सिंह के संघर्षों का उल्लेख किया है।
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सिक्के: इनके समय के कुछ तांबे के सिक्के मिले हैं, जो उस समय की स्थानीय अर्थव्यवस्था की जानकारी देते हैं।
7. सूक्ष्म बारीकियाँ (The Minute Details)
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त्याग की मिसाल: सामंत सिंह ने मेवाड़ की गद्दी अपने छोटे भाई कुमार सिंह के लिए छोड़ दी थी (या कुमार सिंह ने बाद में इसे कीर्तिपाल से वापस लिया), जिससे यह स्पष्ट होता है कि उनमें पारिवारिक एकता के प्रति सम्मान था।
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वागड़ के आदि पुरुष: डूंगरपुर और बाँसवाड़ा के राजघरानों के लोग आज भी सामंत सिंह को अपना मूल पुरुष मानते हैं।
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युद्ध कौशल: उन्हें ‘अश्वारोही युद्ध’ (Cavalry warfare) में निपुण माना जाता था।
रावल सामंत सिंह: एक नज़र में (Table)
| श्रेणी | विवरण |
| पिता | रावल क्षेम सिंह। |
| पत्नी | पृथ्वीबाई (पृथ्वीराज चौहान की बहन)। |
| प्रमुख उपलब्धि | वागड़ (डूंगरपुर) में गुहिल वंश की स्थापना। |
| प्रतिद्वंद्वी | कीर्तिपाल चौहान (जालौर)। |
| अंतिम युद्ध | तराइन का द्वितीय युद्ध (1192 ई.)। |
| मुख्य स्रोत | पृथ्वीराज रासो, माउंट आबू शिलालेख। |
निष्कर्ष:
रावल सामंत सिंह का इतिहास वीरता और बलिदान की पराकाष्ठा है। उन्होंने एक राज्य खोया तो दूसरा बसाया, और अंत में मातृभूमि की रक्षा के लिए तराइन के मैदान में अपने प्राण न्योछावर कर दिए।