अजमेर के चौहान साम्राज्य के पतन के बाद, चौहानों की एक नई और शक्तिशाली शाखा का उदय रणथंभौर (सवाई माधोपुर) में हुआ। इस शाखा ने अपनी वीरता और शरणागत की रक्षा के लिए भारतीय इतिहास में एक विशिष्ट स्थान बनाया।
यहाँ रणथंभौर के चौहानों का सामान्य परिचय दिया गया है:
1. स्थापना (स्थापना वर्ष: 1194 ई.)
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संस्थापक: रणथंभौर के चौहान वंश की नींव गोविंदराज चौहान ने रखी थी।
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गोविंदराज, अजमेर के अंतिम महान सम्राट पृथ्वीराज चौहान तृतीय के पुत्र थे।
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तराइन के द्वितीय युद्ध के बाद उत्पन्न परिस्थितियों में, गोविंदराज ने रणथंभौर को अपना केंद्र बनाया और यहाँ चौहानों का शासन पुनः स्थापित किया।
2. भौगोलिक और रणनीतिक महत्व
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रणथंभौर दुर्ग: यह किला अपनी अभेद्य बनावट के लिए प्रसिद्ध है। यह अरावली और विंध्याचल पर्वत श्रेणियों के संगम पर स्थित है।
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अबुल फजल ने इस दुर्ग के बारे में कहा था: “अन्य सब दुर्ग नंगे हैं, जबकि यह दुर्ग बख्तरबंद है।”
3. प्रमुख शासक
रणथंभौर शाखा में कई प्रतापी राजा हुए, जिन्होंने दिल्ली सल्तनत के सुल्तानों को कड़ी चुनौती दी:
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प्रहलादन: गोविंदराज के उत्तराधिकारी।
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वीरनारायण: इनके समय इल्तुतमिश ने रणथंभौर पर आक्रमण किया था।
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वाग्भट्ट: इन्होंने इल्तुतमिश के बाद दुर्ग पर पुनः अधिकार किया और उसे सुदृढ़ बनाया।
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जैत्रसिंह (जयसिंह): इन्होंने लगभग 32 वर्षों तक शासन किया। उनकी याद में उनके पुत्र हम्मीर देव ने रणथंभौर दुर्ग में ’32 खंभों की छतरी’ (न्याय की छतरी) बनवाया।
4. हम्मीर देव चौहान (1282–1301 ई.)
इस वंश के सबसे प्रतापी और अंतिम शासक हम्मीर देव थे। उनके बारे में “सिंह सवन सत्पुरुष वचन, कदली फलत इक बार। तिरिया तेल हम्मीर हठ, चढ़े न दूजी बार॥” कहावत प्रसिद्ध है।
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हठ और शरणागत वत्सलता: उन्होंने अलाउद्दीन खिलजी के विद्रोही सेनापति मोहम्मद शाह को शरण दी और उसकी रक्षा के लिए अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया।
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रणथंभौर का युद्ध (1301 ई.): अलाउद्दीन खिलजी ने दुर्ग की घेराबंदी की। हम्मीर के सेनापति रणमल और रतिपाल के विश्वासघात के कारण खिलजी का पलड़ा भारी हुआ।
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प्रथम साका (1301 ई.): यह राजस्थान के इतिहास का पहला साका माना जाता है। हम्मीर देव ने केसरिया किया और उनकी रानी रंगादेवी के नेतृत्व में महिलाओं ने जल जौहर (पद्मला तालाब में) किया।
5. सांस्कृतिक और साहित्यिक योगदान
रणथंभौर के चौहानों का इतिहास कई महान ग्रंथों का विषय रहा है:
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हम्मीर महाकाव्य: नयनचंद्र सूरी।
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हम्मीर रासो: जोधराज / सारंगधर।
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हम्मीर हठ: चंद्रशेखर।
निष्कर्ष
रणथंभौर की शाखा ने यह सिद्ध किया कि चौहानों का स्वाभिमान अजमेर के पतन के बाद भी जीवित था। हम्मीर देव की वीरता और उनके ‘हठ’ ने रणथंभौर के नाम को भारतीय शौर्य गाथाओं में सदैव के लिए अमर कर दिया। 1301 ई. में इस दुर्ग पर अलाउद्दीन खिलजी के अधिकार के साथ ही यहाँ चौहानों का शासन समाप्त हो गया।
| क्रम | राजा का नाम | शासन काल (ईस्वी) | मुख्य विवरण / उपलब्धि |
| 1 | गोविंदराज चौहान | 1194 ई. से | संस्थापक; पृथ्वीराज चौहान तृतीय के पुत्र। कुतुबुद्दीन ऐबक की सहायता से स्थापना की। |
| 2 | वल्हणदेव | – | गोविंदराज के पुत्र; इनके समय दिल्ली सल्तनत से संघर्ष शुरू हुआ। |
| 3 | प्रहलादन | – | इनके समय में राज्य की स्थिति अस्थिर रही। |
| 4 | वीरनारायण | – | इल्तुतमिश ने इन्हें धोखे से दिल्ली बुलाकर मार दिया और दुर्ग पर अधिकार किया। |
| 5 | वाग्भट्ट | – | चौहान शक्ति को पुनर्गठित किया और इल्तुतमिश के बाद दुर्ग पर पुनः अधिकार किया। |
| 6 | जैत्रसिंह (जयसिंह) | 1250 – 1282 ई. | इन्होंने 32 वर्षों तक शासन किया। नसीरुद्दीन महमूद के आक्रमण को विफल किया। |
| 7 | हम्मीर देव चौहान | 1282 – 1301 ई. | वंश के सबसे प्रतापी राजा; ‘हठ’ के लिए प्रसिद्ध। अलाउद्दीन खिलजी से युद्ध। |