तराइन का प्रथम युद्ध (1191 ईस्वी) भारतीय इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण युद्धों में से एक है, जिसने दिल्ली और अजमेर के चौहानों की शक्ति को पूरे भारत में स्थापित कर दिया था। यह युद्ध वर्तमान हरियाणा के करनाल जिले में तराइन (तरावड़ी) के मैदान में लड़ा गया था।
युद्ध का मुख्य विवरण
| विवरण | जानकारी |
| समय | 1191 ईस्वी |
| स्थान | तराइन का मैदान (करनाल, हरियाणा) |
| मुख्य पक्ष | पृथ्वीराज चौहान III (राजपूत संघ) ⚔️ मोहम्मद गोरी (घुरीद वंश) |
| सेनापति | दिल्ली के गवर्नर गोविंद राज तोमर (चौहान पक्ष की ओर से) |
| परिणाम | पृथ्वीराज चौहान की प्रचंड विजय |
युद्ध का घटनाक्रम और परिचय
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विवाद की जड़: मोहम्मद गोरी ने पंजाब के तबरहिन्द (भटिंडा) के किले पर कब्जा कर लिया था, जो पृथ्वीराज चौहान के साम्राज्य की सीमा के पास था। इसी किले को वापस पाने के लिए पृथ्वीराज अपनी विशाल सेना के साथ आगे बढ़े।
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राजपूतों का आक्रमण: पृथ्वीराज चौहान के साथ कई राजपूत राजाओं का एक संघ था। युद्ध के मैदान में राजपूत घुड़सवारों ने गोरी की सेना पर दोनों तरफ से जबरदस्त प्रहार किया।
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गोविंद राज का पराक्रम: युद्ध के दौरान दिल्ली के राजा गोविंद राज तोमर और मोहम्मद गोरी का आमना-सामना हुआ। गोविंद राज के प्रहार से गोरी के सामने के दांत टूट गए और वह बुरी तरह घायल हो गया।
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गोरी की जान बची: घायल गोरी अपने घोड़े से गिरने ही वाला था कि एक खिलजी सैनिक ने उसे पहचान लिया और उसे घोड़े पर बिठाकर युद्ध के मैदान से सुरक्षित बाहर निकाल ले गया। सेनापति के भागते ही तुर्क सेना में भगदड़ मच गई।
युद्ध का महत्व और परिणाम
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चौहानों का वर्चस्व: इस जीत ने पृथ्वीराज चौहान को उत्तर भारत का सबसे शक्तिशाली हिंदू शासक बना दिया।
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गोरी की हार: गोरी को अपनी सैन्य रणनीति बदलने पर मजबूर होना पड़ा। वह वापस गजनी गया और एक साल तक अपनी हार का बदला लेने की तैयारी करता रहा।
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एक ऐतिहासिक भूल: पृथ्वीराज चौहान ने भागती हुई तुर्क सेना का पीछा नहीं किया और न ही उन्हें पूरी तरह नष्ट किया। इतिहासकार मानते हैं कि यदि उस समय गोरी को खत्म कर दिया जाता, तो भारत का भविष्य कुछ और होता।
युद्ध से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य (Exam Point of View)
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इस युद्ध का वर्णन चंदबरदाई की रचना ‘पृथ्वीराज रासो’ और हसन निजामी की ‘ताज-उल-मासिर’ में मिलता है।
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पृथ्वीराज चौहान के प्रधान सेनापति का नाम स्कंद था।
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युद्ध के बाद पृथ्वीराज ने भटिंडा के किले पर दोबारा कब्जा करने के लिए 13 महीने तक घेराबंदी की थी।