तराइन का द्वितीय युद्ध 1192 ईस्वी

तराइन का द्वितीय युद्ध (1192 ईस्वी) भारतीय इतिहास का एक ‘टर्निंग पॉइंट’ माना जाता है, क्योंकि इस युद्ध के बाद ही भारत में तुर्क शासन की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हुआ। यह युद्ध उसी मैदान (तराइन) में लड़ा गया जहाँ एक साल पहले गोरी की हार हुई थी।

युद्ध का मुख्य विवरण

विवरण जानकारी
समय 1192 ईस्वी
स्थान तराइन (वर्तमान हरियाणा)
मुख्य पक्ष पृथ्वीराज चौहान III ⚔️ मोहम्मद गोरी
परिणाम मोहम्मद गोरी की निर्णायक विजय

युद्ध का घटनाक्रम: रणनीति और विश्वासघात

  1. गोरी की तैयारी: प्रथम युद्ध में हार के बाद गोरी ने एक साल तक कड़ा अभ्यास किया। वह 1,20,000 सुसज्जित घुड़सवारों के साथ वापस आया। उसने इस बार ताकत के बजाय छल का सहारा लिया।

  2. राजपूतों की स्थिति: पृथ्वीराज चौहान ने भी अन्य राजपूत राजाओं को सहायता के लिए बुलाया, लेकिन उनके ससुर जयचंद (कन्नौज के राजा) के साथ मतभेदों के कारण उन्हें अपेक्षित सहयोग नहीं मिला।

  3. छल और सुबह का हमला: गोरी ने संधि का नाटक करके राजपूतों को झांसे में रखा। जब राजपूत सेना सुबह के नित्य कर्मों में व्यस्त थी और युद्ध के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं थी, तब गोरी ने अचानक हमला कर दिया।

  4. युद्ध कौशल: गोरी ने अपनी सेना को चार टुकड़ियों में बाँटा और ‘तुलगमा’ जैसी पद्धति का उपयोग किया। उसने राजपूतों को थकाने के लिए पीछे हटने का नाटक किया और फिर सुरक्षित रिजर्व सेना से हमला बोला।


युद्ध के परिणाम और प्रभाव

  • दिल्ली सल्तनत की नींव: इस जीत के साथ ही दिल्ली और अजमेर पर तुर्कों का अधिकार हो गया। भारत में मुस्लिम साम्राज्य की औपचारिक शुरुआत यहीं से मानी जाती है।

  • पृथ्वीराज चौहान की नियति: युद्ध के बाद पृथ्वीराज को बंदी बना लिया गया। उनके अंत को लेकर इतिहासकारों के अलग-अलग मत हैं:

    • हसन निजामी के अनुसार, उन्हें कुछ समय बाद मार दिया गया।

    • पृथ्वीराज रासो (चंदबरदाई) के अनुसार, उन्हें गजनी ले जाया गया जहाँ उन्होंने ‘शब्दभेदी बाण’ से गोरी का वध किया।

  • हिसार और सिरसा का पतन: पृथ्वीराज को सरस्वती (सिरसा) के पास पकड़ा गया था।

क्यों हारे राजपूत? (मुख्य कारण)

  • पुरानी युद्ध नीति: राजपूत अब भी हाथियों और पारंपरिक हथियारों पर निर्भर थे, जबकि गोरी के पास तीव्र गति वाले घुड़सवार तीरंदाज थे।

  • एकता का अभाव: स्थानीय राजाओं के बीच आपसी ईर्ष्या और फूट ने गोरी का काम आसान कर दिया।

  • नैतिकता बनाम छल: राजपूत सूर्यास्त के बाद युद्ध न करने जैसे आदर्शों का पालन कर रहे थे, जबकि गोरी ने रात और तड़के हमले करने की योजना बनाई।


इतिहास का सबक: तराइन का प्रथम युद्ध यदि व्यक्तिगत वीरता का प्रतीक था, तो द्वितीय युद्ध सैन्य रणनीति और कूटनीति का। इसके बाद भारत का राजनीतिक नक्शा हमेशा के लिए बदल गया।

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