पाटन का युद्ध (20 जून 1790) मराठा सेनापति महादजी सिंधिया द्वारा तुंगा की हार का बदला लेने के लिए लड़ा गया था। इस युद्ध में राजपूतों की पराजय ने राजस्थान में मराठों के वर्चस्व को पुनः स्थापित कर दिया।
युद्ध का मुख्य विवरण
| विवरण | जानकारी |
| समय | 20 जून 1790 ईस्वी |
| स्थान | पाटन (सीकर जिला, राजस्थान) |
| मुख्य पक्ष | मराठा सेना (महादजी सिंधिया) ⚔️ जयपुर-जोधपुर संयुक्त सेना |
| मराठा सेनापति | डी बोइन (De Boigne) – एक फ्रांसीसी प्रशिक्षित सेनापति |
| राजपूत नेतृत्व | सवाई प्रताप सिंह (जयपुर) और विजय सिंह (जोधपुर) की सेनाएं |
| परिणाम | मराठों की निर्णायक विजय |
युद्ध का घटनाक्रम: तोपखाना बनाम तलवार
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यूरोपीय प्रशिक्षण: इस युद्ध की सबसे बड़ी विशेषता मराठा सेना का आधुनिक स्वरूप था। महादजी सिंधिया ने अपने फ्रांसीसी सेनापति डी बोइन के नेतृत्व में सेना को यूरोपीय पद्धति पर प्रशिक्षित किया था और उनके पास उन्नत तोपखाना था।
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राजपूतों की वीरता: राजपूतों ने परंपरागत साहस के साथ युद्ध किया, लेकिन वे मराठों की अनुशासित पैदल सेना और भारी तोपखाने का मुकाबला नहीं कर सके।
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भीषण नरसंहार: पाटन के मैदान में राजपूत सेना को भारी जन-धन की हानि हुई। मराठों ने राजपूतों के शिविरों को लूट लिया और उनके तोपखाने पर कब्जा कर लिया।
युद्ध के परिणाम और प्रभाव
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अपमानजनक संधि: हार के बाद जयपुर के राजा सवाई प्रताप सिंह को मराठों के साथ संधि करनी पड़ी और उन्हें युद्ध के हर्जाने के रूप में भारी राशि (लगभग 60 लाख रुपये) देने का वादा करना पड़ा।
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अजमेर पर कब्जा: इस जीत के बाद मराठों ने अजमेर के किले (तारागढ़) पर भी अपना नियंत्रण मजबूत कर लिया।
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राजपूत एकता में दरार: इस हार ने राजपूत राजाओं के बीच के आपसी विश्वास को कमजोर कर दिया, जिसका फायदा बाद में अंग्रेजों ने उठाया।
मेड़ता का युद्ध (सितंबर 1790)
पाटन की जीत के तुरंत बाद, डी बोइन ने जोधपुर की सेना को मेड़ता के युद्ध में भी पराजित किया। इन दो जीतों ने महादजी सिंधिया को उत्तर भारत का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति बना दिया और उनका “जयपुर को धूल में मिलाने” का प्रण लगभग पूरा हो गया।