तुंगा का युद्ध (28 जुलाई 1787)

तुंगा का युद्ध (28 जुलाई 1787) राजस्थान के इतिहास का वह गौरवशाली क्षण है जब राजपूत शक्तियों ने संगठित होकर मराठा सेनापति महादजी सिंधिया की अजेय शक्ति को चुनौती दी और उन्हें पीछे हटने पर मजबूर कर दिया।

युद्ध का मुख्य विवरण

विवरण जानकारी
समय 28 जुलाई 1787 ईस्वी
स्थान तुंगा का मैदान (बस्सी के पास, जयपुर)
मुख्य पक्ष जयपुर-जोधपुर संयुक्त सेना ⚔️ महादजी सिंधिया (मराठा)
राजपूत नेतृत्व सवाई प्रताप सिंह (जयपुर) और विजय सिंह (जोधपुर)
परिणाम राजपूतों की रणनीतिक विजय (मराठों का पीछे हटना)

युद्ध के मुख्य कारण

  1. मराठों का बढ़ता कर (खिराज): मराठा जयपुर रियासत से भारी धन की मांग कर रहे थे। सवाई प्रताप सिंह ने बकाया कर देने से मना कर दिया, जिससे महादजी सिंधिया नाराज हो गए।

  2. राजपूत एकता: इस समय जयपुर और जोधपुर की रियासतों ने महसूस किया कि मराठों को अकेले हराना मुश्किल है, इसलिए उन्होंने एक संयुक्त गठबंधन बनाया।


युद्ध का घटनाक्रम और वीरता

  • भीषण संघर्ष: तुंगा के मैदान में दोपहर के समय युद्ध शुरू हुआ। जोधपुर के राठौड़ घुड़सवारों ने मराठों के तोपखाने पर ऐसा जबरदस्त हमला किया कि मराठा सेना में खलबली मच गई।

  • महादजी सिंधिया की हार: महादजी सिंधिया, जो उत्तर भारत के सबसे शक्तिशाली सेनापति माने जाते थे, इस युद्ध में सफल नहीं हो पाए। राजपूतों के निरंतर प्रहारों के कारण उन्हें अपनी सेना पीछे हटानी पड़ी।

  • निर्णायक मोड़: हालांकि इस युद्ध का कोई पूर्ण सैन्य परिणाम नहीं निकला (क्योंकि दोनों पक्ष भारी नुकसान के बाद पीछे हटे), लेकिन मराठों का जयपुर से पीछे हट जाना राजपूतों की एक बड़ी नैतिक और रणनीतिक जीत थी।


महादजी सिंधिया का प्रसिद्ध कथन

हार और पीछे हटने की निराशा में महादजी सिंधिया ने कसम खाते हुए कहा था:

“यदि मैं जीवित रहा, तो इस जयपुर को धूल में मिला दूँगा।”

(If I live, I will reduce Jaipur to dust.)


युद्ध के परिणाम

  • राजपूतों का बढ़ता मनोबल: इस जीत ने राजस्थान की रियासतों को यह विश्वास दिलाया कि वे मराठों का मुकाबला कर सकते हैं।

  • बदले की कार्रवाई: अपनी इस हार का बदला लेने के लिए महादजी सिंधिया ने बाद में 1790 में पाटन और मेड़ता के युद्ध लड़े, जहाँ उन्होंने राजपूतों को परास्त किया।


विशेष तथ्य: सवाई प्रताप सिंह वही राजा हैं जिन्होंने 1799 में जयपुर का प्रसिद्ध ‘हवा महल’ बनवाया था। वे स्वयं ‘ब्रजनिधि’ के नाम से कविताएँ लिखते थे।

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