गिरी-सुमेल का युद्ध (जनवरी 1544) राजस्थान के सैन्य इतिहास का सबसे भयंकर और रणनीतिक युद्ध माना जाता है। इस युद्ध ने न केवल मारवाड़ बल्कि दिल्ली के सुल्तान के भाग्य का भी फैसला किया था।
युद्ध का मुख्य विवरण
| विवरण | जानकारी |
| समय | 5 जनवरी 1544 ईस्वी |
| स्थान | गिरी और सुमेल गांव (जैतारण, वर्तमान ब्यावर/पाली जिला) |
| मुख्य पक्ष | राव मालदेव (मारवाड़) ⚔️ शेरशाह सूरी (दिल्ली सुल्तान) |
| सेनापति (वीर) | जैता और कूंपा (मालदेव की ओर से) |
| परिणाम | शेरशाह सूरी की अत्यंत कठिन और कूटनीतिक विजय |
युद्ध की पृष्ठभूमि और शेरशाह का छल
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मालदेव की शक्ति: उस समय राव मालदेव उत्तर भारत के सबसे शक्तिशाली शासक थे। शेरशाह सूरी उनकी शक्ति से भयभीत था और सीधे युद्ध में उन्हें हराना असंभव समझता था।
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जाली पत्रों का षड्यंत्र: शेरशाह ने एक चाल चली। उसने मालदेव के शिविर के पास कुछ जाली पत्र गिरवा दिए, जिनमें लिखा था कि मालदेव के सेनापति (जैता और कूंपा) शेरशाह से मिल गए हैं और वे युद्ध के समय मालदेव को बंदी बना लेंगे।
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मालदेव का पीछे हटना: अपने सेनापतियों पर अविश्वास होने के कारण मालदेव युद्ध शुरू होने से पहले ही अपनी मुख्य सेना लेकर जोधपुर लौट गए।
जैता और कूंपा का शौर्य
जब जैता और कूंपा को पता चला कि उनके स्वामी ने उन पर संदेह किया है, तो उन्होंने अपने माथे से गद्दारी का कलंक धोने के लिए मात्र 8,000 से 10,000 सैनिकों के साथ शेरशाह की 80,000 की विशाल सेना पर हमला कर दिया।
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भीषण प्रहार: राजपूतों ने इतनी वीरता से लड़ाई लड़ी कि शेरशाह की सेना के पैर उखड़ गए। एक समय ऐसा आया जब शेरशाह हार मानकर नमाज पढ़ने बैठ गया और उसे अपनी हार निश्चित लगने लगी।
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अंतिम समय में मदद: ठीक उसी समय शेरशाह का एक आरक्षित सेनापति जलाल खान जलवानी नई सेना के साथ पहुँच गया, जिससे युद्ध का पासा पलट गया और जैता-कूंपा लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।
शेरशाह का प्रसिद्ध कथन
युद्ध जीतने के बाद, अपनी जान और सल्तनत बाल-बाल बची देख शेरशाह सूरी के मुँह से ऐतिहासिक शब्द निकले:
“खुदा का शुक्र है कि किसी तरह फतह (जीत) हासिल हो गई, वरना मैं मुट्ठी भर बाजरे के लिए हिंदुस्तान की बादशाहत खो देता।”
(बाजरा मारवाड़ की मुख्य फसल थी, जिसका अर्थ था कि मारवाड़ जैसे रेतीले प्रदेश को जीतने के चक्कर में वह अपनी दिल्ली की गद्दी गँवा देता।)
ऐतिहासिक महत्व
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जोधपुर पर अधिकार: इस युद्ध के बाद शेरशाह ने जोधपुर के किले (मेहरानगढ़) पर अधिकार कर लिया और ख्वास खान को वहाँ का हाकिम नियुक्त किया।
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ईमानदारी की मिसाल: जैता और कूंपा का नाम राजस्थान के इतिहास में ‘अटूट स्वामीभक्ति’ और ‘वीरता’ के लिए अमर हो गया।