पाहेबा या साहेबा का युद्ध (1541-42 ईस्वी)

पाहेबा या साहेबा का युद्ध (1541-42 ईस्वी) मारवाड़ के विस्तारवादी शासक राव मालदेव और बीकानेर के राव जैतसी के बीच लड़ा गया एक अत्यंत महत्वपूर्ण युद्ध था। यह युद्ध मारवाड़ की शक्ति के चरमोत्कर्ष और बीकानेर के राठौड़ों के बीच के आंतरिक संघर्ष को दर्शाता है।

युद्ध का मुख्य विवरण

विवरण जानकारी
समय 1541-42 ईस्वी
स्थान पाहेबा/साहेबा का मैदान (फलोदी के पास, तत्कालीन मारवाड़-बीकानेर सीमा)
मुख्य पक्ष राव मालदेव (जोधपुर) ⚔️ राव जैतसी (बीकानेर)
सेनापति कूपां (मालदेव की ओर से मुख्य सेनापति)
परिणाम राव मालदेव की निर्णायक विजय

युद्ध के मुख्य कारण

  1. मालदेव की विस्तारवादी नीति: राव मालदेव को ‘हशमत वाला राजा’ कहा जाता था। वह अपनी सीमाओं का विस्तार करना चाहते थे और उन्होंने बीकानेर पर अधिकार करने की योजना बनाई।

  2. सीमा विवाद: मारवाड़ और बीकानेर दोनों ही राठौड़ वंश की शाखाएं थीं, लेकिन वर्चस्व की लड़ाई के कारण उनके संबंध बिगड़ चुके थे।


युद्ध का घटनाक्रम और परिणाम

  • जैतसी का बलिदान: बीकानेर के शासक राव जैतसी ने बड़ी वीरता से मालदेव की विशाल सेना का मुकाबला किया, लेकिन युद्ध के मैदान में वे वीरगति को प्राप्त हुए।

  • बीकानेर पर अधिकार: जीत के बाद राव मालदेव ने बीकानेर के किले पर कब्जा कर लिया और अपने सेनापति कूपां को वहाँ का प्रशासक नियुक्त किया।

  • कल्याणमल का पलायन: राव जैतसी के पुत्र कल्याणमल बीकानेर छोड़कर भाग गए और उन्होंने शेरशाह सूरी से मदद मांगी। यही कारण था कि आगे चलकर गिरी-सुमेल (1544) के युद्ध में कल्याणमल ने शेरशाह सूरी का साथ दिया।


ऐतिहासिक महत्व

  • इस युद्ध के बाद राव मालदेव का प्रभाव इतना बढ़ गया कि वे राजस्थान के सबसे शक्तिशाली शासक बन गए। उनकी सीमाएं अब दिल्ली और मेवाड़ को स्पर्श करने लगी थीं।

  • इस युद्ध का वर्णन बीठू सूजा द्वारा रचित ग्रंथ ‘राव जैतसी रो छंद’ में विस्तार से मिलता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *