रणथंभौर का युद्ध (1301 ईस्वी) राजस्थान के इतिहास का एक अत्यंत महत्वपूर्ण युद्ध है, क्योंकि इसी युद्ध के दौरान राजस्थान का प्रथम साका (Saka) और जौहर हुआ था। यह युद्ध दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी की साम्राज्यवादी नीति और हम्मीर देव चौहान के ‘शरणागत की रक्षा’ के हठ के बीच का संघर्ष था।
युद्ध का मुख्य विवरण
| विवरण | जानकारी |
| समय | जुलाई 1301 ईस्वी |
| स्थान | रणथंभौर दुर्ग (सवाई माधोपुर) |
| मुख्य पक्ष | राव हम्मीर देव चौहान ⚔️ अलाउद्दीन खिलजी |
| विश्वासघाती | रणमल और रतिपाल (हम्मीर के सेनापति) |
| परिणाम | अलाउद्दीन खिलजी की विजय |
युद्ध के मुख्य कारण
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हम्मीर का हठ (शरणागत की रक्षा): सबसे प्रमुख कारण यह था कि हम्मीर देव ने अलाउद्दीन खिलजी के विद्रोही मंगोल सेनापति मोहम्मद शाह और उसके भाई केहब को शरण दी थी। खिलजी के मांगने पर भी हम्मीर ने उन्हें सौंपने से मना कर दिया।
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सामरिक महत्व: रणथंभौर का किला अभेद्य माना जाता था। अबुल फजल ने इसके बारे में कहा है— “बाकी सब किले नंगे हैं, जबकि यह बख्तरबंद है।”
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खिलजी की विस्तारवादी नीति: अलाउद्दीन पूरे भारत पर अधिकार करना चाहता था और दिल्ली के पास इतना शक्तिशाली राजपूत राज्य उसे खटक रहा था।
युद्ध का घटनाक्रम
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प्रारंभिक असफलता: खिलजी ने पहले अपने सेनापति उलूग खान और नुसरत खान को भेजा। इस संघर्ष में नुसरत खान मारा गया और शाही सेना को पीछे हटना पड़ा।
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घेराबंदी: अंत में अलाउद्दीन खिलजी खुद एक विशाल सेना लेकर आया और करीब एक साल तक किले की घेराबंदी की, लेकिन उसे सफलता नहीं मिली।
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छल-कपट: जब खिलजी सीधे युद्ध में नहीं जीत पाया, तो उसने हम्मीर के दो सेनापतियों, रणमल और रतिपाल को लालच देकर अपनी ओर मिला लिया। उन्होंने किले के गुप्त रास्तों और खाद्य सामग्री में अपवित्र चीजें मिलाने में मदद की।
साका और जौहर (11 जुलाई 1301)
किले के अंदर खाद्य सामग्री समाप्त होने के कारण राजपूतों ने ‘साका’ करने का निर्णय लिया:
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जौहर: रानी रंगदेवी के नेतृत्व में राजपूत महिलाओं ने अग्नि जौहर किया। (कुछ स्रोतों के अनुसार हम्मीर की पुत्री पद्मला/देवलदे ने ‘पद्मला तालाब’ में कूदकर जल जौहर किया था)।
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केसरिया: हम्मीर देव और उनके वफादार सैनिकों ने केसरिया बाना पहनकर अंतिम सांस तक युद्ध किया और वीरगति को प्राप्त हुए।
महत्वपूर्ण तथ्य (याद रखने योग्य)
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अमीर खुसरो: प्रसिद्ध विद्वान अमीर खुसरो इस युद्ध के दौरान अलाउद्दीन के साथ था। उसने जीत के बाद कहा था— “आज कुफ्र का गढ़ इस्लाम का घर हो गया।”
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हम्मीर की ख्याति: हम्मीर देव अपनी न्यायप्रियता और हठ के लिए प्रसिद्ध थे। उनके बारे में एक प्रसिद्ध दोहा है:
“सिंह सवन, सत्पुरुष वचन, कदली फलत इक बार। तिरिया तेल, हम्मीर हठ, चढ़े न दूजी बार॥”
इस युद्ध के बाद रणथंभौर पर चौहानों का शासन समाप्त हो गया और खिलजी ने उलूग खान को यहाँ का प्रशासक नियुक्त किया।
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