बगरू का युद्ध (अगस्त 1748)

बगरू का युद्ध (अगस्त 1748) राजमहल के युद्ध (1747) का ही अगला चरण था। जहाँ राजमहल में ईश्वरी सिंह विजयी हुए थे, वहीं बगरू के युद्ध ने जयपुर की राजनीति और ईश्वरी सिंह के भविष्य को संकट में डाल दिया था।

युद्ध का मुख्य विवरण

विवरण जानकारी
समय अगस्त 1748 ईस्वी
स्थान बगरू (जयपुर के पास)
मुख्य पक्ष सवाई ईश्वरी सिंह ⚔️ माधो सिंह (मराठों और मेवाड़ के सहयोग से)
मराठा नेतृत्व मल्हारराव होलकर
परिणाम माधो सिंह की विजय (ईश्वरी सिंह की हार)

युद्ध की पृष्ठभूमि

राजमहल के युद्ध में हार के बाद माधो सिंह शांत नहीं बैठे। उन्होंने मराठा सरदार मल्हारराव होलकर को भारी धन का लालच देकर अपनी ओर मिला लिया। इस बार माधो सिंह के पास मेवाड़, कोटा और मराठों की संयुक्त शक्ति पहले से कहीं अधिक संगठित थी।

युद्ध का घटनाक्रम और संधि

  1. भीषण संघर्ष: बगरू के मैदान में ईश्वरी सिंह की सेना ने बहादुरी से मुकाबला किया, लेकिन मराठों की छापामार युद्ध नीति और रसद की कमी के कारण ईश्वरी सिंह दबाव में आ गए।

  2. 6 दिन की घेराबंदी: युद्ध कई दिनों तक चला। अंत में ईश्वरी सिंह को लगा कि वे इस संयुक्त शक्ति को और अधिक समय तक नहीं झेल पाएंगे।

  3. विवशता में संधि: ईश्वरी सिंह को एक अपमानजनक संधि करनी पड़ी, जिसकी मुख्य शर्तें थीं:

    • माधो सिंह को जयपुर राज्य के 5 परगने (इलाके) देने पड़े।

    • मराठों को भारी मात्रा में ‘खिराज’ (युद्ध का हर्जाना और टैक्स) देने का वादा करना पड़ा।

    • बूंदी के राजा उम्मेद सिंह को उनका राज्य वापस दिलाना पड़ा।


इस युद्ध का प्रभाव (एक दुखद परिणाम)

बगरू के युद्ध ने ईश्वरी सिंह को आर्थिक और मानसिक रूप से तोड़ दिया था।

  • मराठों का आतंक: संधि के बाद मराठा बार-बार धन की मांग करने लगे। जब ईश्वरी सिंह वादा किया गया धन नहीं दे पाए, तो मराठा सेना ने जयपुर को घेर लिया।

  • आत्महत्या: मराठों के बढ़ते दबाव और अपने ही सामंतों के विश्वासघात से दुखी होकर 12 दिसंबर 1750 को सवाई ईश्वरी सिंह ने जहर पीकर और सांप से डसवाकर आत्महत्या कर ली।


विशेष तथ्य

  • ईश्वरी सिंह जयपुर के एकमात्र ऐसे राजा थे जिनका दाह संस्कार ‘सिटी पैलेस’ (जय निवास उद्यान) में किया गया था, न कि गेटोर की छतरियों में।

  • उनकी मृत्यु के बाद माधो सिंह I जयपुर के शासक बने।

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