मतीरे की राड़ (1644 ईस्वी)

मतीरे की राड़ (1644 ईस्वी) राजस्थान के इतिहास का शायद सबसे अजीबोगरीब और अनोखा युद्ध है। यह दुनिया का संभवतः इकलौता ऐसा युद्ध है जो किसी साम्राज्य या उत्तराधिकार के लिए नहीं, बल्कि एक मतीरे (तरबूज) के फल के अधिकार को लेकर लड़ा गया था।

यह युद्ध बीकानेर और नागौर रियासतों के बीच हुआ था।

युद्ध का मुख्य विवरण

विवरण जानकारी
समय 1644 ईस्वी
स्थान सिलवा गांव (बीकानेर) और जाखणिया गांव (नागौर) की सीमा
मुख्य पक्ष करण सिंह (बीकानेर) ⚔️ अमर सिंह राठौड़ (नागौर)
विवाद का कारण एक मतीरे की बेल और उसका फल
परिणाम बीकानेर की सेना की विजय (प्रारंभिक संघर्ष में)

युद्ध का रोचक कारण (एक फल के लिए संघर्ष)

  1. बेल की स्थिति: बीकानेर रियासत के सिलवा गांव के एक किसान ने मतीरे का बीज बोया। बेल बड़ी हुई और रेंगते हुए पड़ोसी रियासत नागौर के जाखणिया गांव के एक खेत में चली गई।

  2. विवाद: मतीरा नागौर की सीमा में लगा था। बीकानेर का किसान बोला— “बीज मेरा है, खेत मेरा है, इसलिए फल मेरा है।” नागौर का किसान बोला— “फल मेरी जमीन पर लगा है, इसलिए यह मेरा है।”

  3. गांव से रियासत तक: यह झगड़ा पहले किसानों के बीच हुआ, फिर दोनों गाँवों के चौधरी भिड़ गए और अंत में यह मामला दोनों रियासतों के राजाओं (करण सिंह और अमर सिंह) तक पहुँच गया। उस समय दोनों राजा मुगल दरबार में थे, लेकिन पीछे से उनकी सेनाएं आमने-सामने आ गईं।


युद्ध का घटनाक्रम और परिणाम

  • सैन्य हस्तक्षेप: दोनों तरफ से फौजें भेजी गईं। यह कोई छोटी झड़प नहीं थी, बल्कि एक व्यवस्थित युद्ध था जिसमें दोनों ओर के सैनिक मारे गए थे।

  • बीकानेर की जीत: इस संघर्ष में बीकानेर की सेना ने नागौर की सेना को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया और मतीरे पर अपना अधिकार जमाया।

  • अमर सिंह राठौड़ का क्रोध: जब नागौर के शासक अमर सिंह को इस हार का पता चला, तो वे बहुत क्रोधित हुए। (अमर सिंह वही प्रतापी योद्धा हैं जो अपनी ‘कटार’ के लिए प्रसिद्ध थे और जिन्होंने बाद में मुगल दरबार में सलावत खान का वध किया था)।


ऐतिहासिक महत्व

  • यह युद्ध राजस्थान की “सीमा विवाद” (Border disputes) के प्रति संवेदनशीलता को दर्शाता है।

  • यह लोक कथाओं में आज भी जीवित है कि कैसे एक छोटे से फल ने दो बड़ी रियासतों को युद्ध के मुहाने पर खड़ा कर दिया था।

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