कान्हड़देव चौहान

कान्हड़देव चौहान (शासनकाल: 1305–1311 ई.) जालौर के सोनगरा चौहान वंश के अंतिम और सबसे प्रतापी शासक थे। उन्हें उनकी वीरता, स्वाभिमान और दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के विरुद्ध उनके ऐतिहासिक संघर्ष के लिए याद किया जाता है।

यहाँ कान्हाड़देव के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई है:


1. दिल्ली से संघर्ष का मुख्य कारण

अलाउद्दीन खिलजी और कान्हाड़देव के बीच शत्रुता के कई कारण थे:

  • गुजरात अभियान (1299 ई.): खिलजी की सेना जब गुजरात के सोमनाथ मंदिर को लूटकर लौट रही थी, तब कान्हाड़देव ने उन्हें अपने राज्य से निकलने का रास्ता देने से मना किया और उन पर हमला कर लूटा हुआ माल (और हिंदू बंदियों) को मुक्त करा लिया।

  • साम्राज्य विस्तार: अलाउद्दीन पूरे राजपूताना को अपने अधीन करना चाहता था और जालौर दक्षिण भारत जाने के मार्ग में एक महत्वपूर्ण बाधा था।

  • वीरमदेव और फिरोजा (लोक कथा): एक प्रसिद्ध लोक मान्यता के अनुसार, अलाउद्दीन की पुत्री फिरोजा कान्हाड़देव के पुत्र वीरमदेव से प्रेम करती थी, लेकिन वीरमदेव ने तुर्क राजकुमारी से विवाह करने के बजाय धर्म की रक्षा के लिए युद्ध को चुना।

2. सिवाना का युद्ध (जालौर की कुंजी) – 1308 ई.

जालौर को जीतने से पहले अलाउद्दीन को सिवाना दुर्ग जीतना जरूरी था:

  • सिवाना का रक्षक कान्हाड़देव का भतीजा सातलदेव (शीतलदेव) था।

  • खिलजी ने छल से दुर्ग के जल स्रोत (भांडेलाव तालाब) को अपवित्र कर दिया।

  • सातलदेव वीरगति को प्राप्त हुए और यहाँ साका हुआ। खिलजी ने सिवाना का नाम बदलकर ‘खैराबाद’ रख दिया।

3. जालौर का साका (1311 ई.)

सिवाना के बाद खिलजी ने जालौर को घेरा। यह युद्ध भारतीय शौर्य गाथाओं का शिखर है:

  • विश्वासघात: जब तुर्क सेना सीधे युद्ध में सफल नहीं हो पाई, तो उन्होंने दहिया राजपूत बीका को लालच देकर अपनी ओर मिला लिया। बीका ने किले के एक कच्चे और गुप्त रास्ते की जानकारी खिलजी को दे दी।

  • केसरिया: कान्हाड़देव चौहान, उनके पुत्र वीरमदेव और हजारों राजपूत योद्धाओं ने केसरिया बाना पहनकर अंतिम युद्ध लड़ा और वीरगति प्राप्त की।

  • जौहर: रानी जैतलदे के नेतृत्व में दुर्ग की महिलाओं ने जौहर किया।

  • परिणाम: जालौर पर खिलजी का अधिकार हो गया और उसने इसका नाम बदलकर ‘जलालाबाद’ कर दिया।


4. साहित्यिक स्रोत (Most Important)

कान्हाड़देव के बारे में जानकारी के लिए हम पूरी तरह इन दो महान ग्रंथों पर निर्भर हैं:

  1. कान्हड़दे प्रबंध: इसके रचयिता पद्मनाभ हैं। यह ग्रंथ कान्हाड़देव और अलाउद्दीन के युद्ध का सबसे विस्तृत और आँखों देखा विवरण प्रस्तुत करता है।

  2. वीरमदेव सोनगरा री वात: यह भी पद्मनाभ द्वारा रचित है, जो विशेष रूप से कान्हाड़देव के पुत्र वीरमदेव पर केंद्रित है।

5. कान्हाड़देव का व्यक्तित्व

  • धर्म रक्षक: सोमनाथ मंदिर की मूर्तियों को तुर्कों से छुड़ाकर उन्होंने अपने धर्म के प्रति अटूट आस्था दिखाई।

  • वीरता: उन्होंने विश्व विजेता कहे जाने वाले अलाउद्दीन खिलजी की सेना को कई बार धूल चटाई।

  • अंतिम निर्णय: उन्होंने अधीनता स्वीकार करने के बजाय मृत्यु को गले लगाना श्रेष्ठ समझा।


कान्हाड़देव चौहान – महत्वपूर्ण तथ्य

श्रेणी विवरण
पुत्र कुंवर वीरमदेव (प्रसिद्ध योद्धा)
सेनापति जेता और देवड़ा
मुख्य युद्ध जालौर का युद्ध (1311 ई.)
निर्माण खिलजी ने जीत के बाद जालौर में ‘अलाई मस्जिद’ (तोपखाना मस्जिद) बनवाई।

निष्कर्ष:

कान्हाड़देव की मृत्यु के साथ ही जालौर के सोनगरा चौहानों का शासन समाप्त हो गया, लेकिन उनका नाम आज भी राजस्थानी लोक-साहित्य में एक अमर नायक के रूप में जीवित है।

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