सिरोही के चौहानों का इतिहास राजस्थान के दक्षिण-पश्चिम क्षेत्र की वीरता और सांस्कृतिक गौरव की कहानी है। इस शाखा को ‘देवड़ा चौहान’ के नाम से जाना जाता है। वे मूल रूप से जालौर के सोनगरा चौहानों की ही एक उप-शाखा थे।
यहाँ सिरोही के चौहानों का सामान्य परिचय दिया गया है:
1. स्थापना और मूल (Origin & Foundation)
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शाखा: देवड़ा चौहान (सोनगरा चौहानों के वंशज)।
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संस्थापक: लुम्भा (Lumbha)।
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स्थापना का समय: लुम्भा ने 1311 ई. के आसपास आबू के परमारों को पराजित किया और चंद्रावती को अपनी राजधानी बनाकर देवड़ा वंश की नींव रखी।
2. प्रमुख राजधानियाँ (Capitals)
सिरोही राज्य के इतिहास में तीन प्रमुख केंद्र रहे:
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चंद्रावती: लुम्भा के समय की प्रारंभिक राजधानी (प्राचीन भव्य नगर)।
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सारणेश्वर (शिवपुरी): राजा रायमल के पुत्र शिवभाण ने 1405 ई. में इसे बसाया।
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सिरोही: महाराज सहसमल ने 1425 ई. में सिरोही नगर की स्थापना की और इसे अपनी स्थायी राजधानी बनाया।
3. प्रमुख शासक और उनके कार्य
| शासक का नाम | मुख्य विवरण / उपलब्धि |
| राव लुम्भा | सिरोही के चौहान वंश के संस्थापक। आबू और चंद्रावती पर अधिकार किया। |
| राव सहसमल | 1425 ई. में सिरोही नगर बसाया। मेवाड़ के महाराणा कुम्भा के साथ इनका सीमा संघर्ष रहा। |
| राव लाखा | इनके समय में पावागढ़ (गुजरात) से द्वारकाधीश की मूर्ति लाकर सिरोही में स्थापित की गई। |
| राव सुरताण | दत्ताणी का युद्ध (1583 ई.): अकबर की सेना को पराजित किया। ये अपनी स्वतंत्रता के लिए प्रसिद्ध रहे। |
| शिवसिंह | 1823 ई.: इन्होंने अंग्रेजों (EIC) के साथ संधि की। सिरोही राजस्थान की अंतिम रियासत थी जिसने अंग्रेजों से संधि की। |
4. ऐतिहासिक युद्ध: दत्ताणी का युद्ध (1583 ई.)
सिरोही के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण युद्ध राव सुरताण और मुगल सम्राट अकबर के बीच हुआ।
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अकबर ने जगमाल (महाराणा प्रताप के भाई) को सिरोही का आधा राज्य दे दिया था।
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राव सुरताण ने वीरतापूर्वक लड़ते हुए जगमाल और मुगल सेना को पराजित किया और अपनी स्वतंत्रता अक्षुण्ण रखी।
5. प्रमुख मंदिर और पर्यटन स्थल
सिरोही के चौहानों ने कला और धर्म को भी बढ़ावा दिया:
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अचलगढ़ दुर्ग: कुम्भा ने इसका पुनर्निर्माण करवाया था, लेकिन यह क्षेत्र देवड़ा चौहानों के प्रभाव में रहा।
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सारणेश्वर महादेव मंदिर: यह देवड़ा चौहानों के कुलदेवता का मंदिर है।
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अर्बुदा देवी (अधर देवी): आबू पर्वत पर स्थित महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल।
6. सिरोही – एक नजर में
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प्रसिद्ध तलवारें: सिरोही अपनी तलवारों के निर्माण के लिए पूरे भारत में प्रसिद्ध रही है।
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भौगोलिक पहचान: यह राज्य अरावली की सबसे ऊँची चोटी ‘गुरुशिखर’ और ‘माउंट आबू’ के लिए जाना जाता है।
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संधि का महत्व: सिरोही ने सबसे अंत में (1823 ई.) अंग्रेजों की अधीनता स्वीकार की थी, जो उनकी स्वतंत्र प्रवृत्ति को दर्शाता है।
सिरोही के देवड़ा चौहान वंश के प्रमुख शासकों की कालक्रमानुसार सूची नीचे दी गई है। इस शाखा ने आबू और सिरोही के पहाड़ी क्षेत्रों पर लंबे समय तक शासन किया:
सिरोही के देवड़ा चौहान – शासक वंशावली
| क्रम | राजा का नाम | शासन काल (ईस्वी) | मुख्य विवरण / उपलब्धि |
| 1 | राव लुम्भा | 1311 – 1321 ई. | संस्थापक; आबू के परमारों को हराकर चंद्रावती को राजधानी बनाया। |
| 2 | राव रायमल | 1392 – 1404 ई. | इन्होंने राज्य का विस्तार किया। इनके पुत्र शिवभाण ने शिवपुरी बसाई। |
| 3 | राव शिवभाण | 1404 – 1424 ई. | इन्होंने सारणेश्वर (शिवपुरी) की स्थापना की और उसे राजधानी बनाया। |
| 4 | राव सहसमल | 1424 – 1451 ई. | 1425 ई. में सिरोही नगर बसाया। महाराणा कुम्भा के समकालीन। |
| 5 | राव लाखा | 1451 – 1483 ई. | पावागढ़ से द्वारकाधीश की मूर्ति लाए। मेवाड़ और गुजरात के बीच संतुलन बनाए रखा। |
| 6 | राव जगमाल | 1483 – 1523 ई. | खानवा के युद्ध (1527 ई.) में राणा सांगा की सहायता के लिए सेना भेजी थी। |
| 7 | राव सुरताण | 1572 – 1610 ई. | दत्ताणी का युद्ध (1583 ई.); अकबर की सेना को हराया। अपनी स्वतंत्रता के लिए प्रसिद्ध। |
| 8 | राव बैरीसाल | 1697 – 1705 ई. | औरंगजेब के समय मारवाड़ के अजीत सिंह को शरण दी थी। |
| 9 | महाराव शिवसिंह | 1818 – 1862 ई. | 1823 ई. में ईस्ट इंडिया कंपनी से संधि की (राजस्थान की अंतिम रियासत)। |
इतिहास के महत्वपूर्ण तथ्य
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राजधानियों का क्रम: इस वंश ने अपनी सुरक्षा के लिए समय-समय पर राजधानियाँ बदलीं: चंद्रावती-> शिवपुरी (सारणेश्वर) -> सिरोही।
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स्वतंत्रता प्रेमी सुरताण: राव सुरताण इतने स्वाभिमानी थे कि उन्होंने अकबर की अधीनता स्वीकार करने के बजाय जीवन भर संघर्ष किया। उनके शौर्य के कारण ही उन्हें ‘सिरोही का शेर’ जैसी ख्याति प्राप्त हुई।
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अंतिम संधि: सिरोही राजस्थान की वह रियासत थी जिसने सबसे अंत में अंग्रेजों का संरक्षण स्वीकार किया। इसके पीछे मारवाड़ (जोधपुर) के साथ उनके सीमा विवाद और आंतरिक संघर्ष प्रमुख कारण थे।
विशेष जानकारी:
सिरोही अपनी तलवारों के लिए विश्व प्रसिद्ध रही है। यहाँ के कारीगरों द्वारा बनाई गई ‘सिरोही की तलवार’ अपनी मजबूती और धार के लिए राजपूत योद्धाओं की पहली पसंद हुआ करती थी।