महाराव किशोरसिंह द्वितीय (शासनकाल: 1819–1828 ई.) का शासनकाल कोटा के इतिहास में संघर्ष और सत्ता के टकराव का दौर माना जाता है। वे महाराव उम्मेदसिंह प्रथम के पुत्र थे। उनके समय की सबसे प्रमुख घटना महाराव और उनके शक्तिशाली प्रधानमंत्री झाला जालिम सिंह के बीच का संघर्ष था।
यहाँ महाराव किशोरसिंह द्वितीय के बारे में विस्तृत विवरण दिया गया है:
1. सत्ता का संघर्ष (महाराव बनाम झाला जालिम सिंह)
उम्मेदसिंह प्रथम के समय तक महाराव और झाला परिवार के बीच संबंध मधुर थे, लेकिन किशोरसिंह द्वितीय के गद्दी पर बैठते ही स्थितियाँ बदल गईं:
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अधिकारों की मांग: किशोरसिंह द्वितीय एक स्वाभिमानी शासक थे और वे झाला जालिम सिंह के पूर्ण नियंत्रण से मुक्त होकर स्वयं शासन करना चाहते थे।
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1817 की संधि का पेच: अंग्रेजों और कोटा के बीच हुई संधि की ‘पूरक धारा’ के अनुसार, प्रशासनिक शक्तियाँ झाला वंश के पास ही रहनी थीं। अंग्रेजों ने इस विवाद में झाला जालिम सिंह का साथ दिया, जिससे महाराव नाराज हो गए।
2. मांगरोल का युद्ध (1821 ई.)
यह कोटा के इतिहास का एक दुखद और महत्वपूर्ण मोड़ था, जहाँ एक राजा अपनी ही सेना और प्रधानमंत्री के विरुद्ध लड़ा:
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युद्ध का कारण: जब आपसी विवाद सुलझ नहीं पाया, तो महाराव किशोरसिंह ने अपने समर्थकों और कुछ हाड़ा सरदारों के साथ विद्रोह कर दिया।
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परिणाम: बारां के पास मांगरोल के मैदान में महाराव की सेना और झाला जालिम सिंह (जिन्हें अंग्रेजों का सैन्य समर्थन प्राप्त था) के बीच युद्ध हुआ।
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हार और संधि: इस युद्ध में महाराव की हार हुई। उन्हें नाथद्वारा (मेवाड़) शरण लेनी पड़ी। बाद में अंग्रेजों की मध्यस्थता से एक समझौता हुआ और वे पुनः कोटा आए, लेकिन उन्हें केवल ‘नाममात्र का शासक’ बनकर रहना स्वीकार करना पड़ा।
3. निर्माण और कला (Construction & Art)
तनावपूर्ण राजनीतिक माहौल के बावजूद, उनके समय में कला के प्रति रुझान बना रहा:
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कोटा चित्रकला: इनके समय के चित्रों में दरबारी संघर्ष और शिकार के दृश्यों के साथ-साथ धार्मिक जुलूसों का सुंदर चित्रण मिलता है।
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धार्मिक आस्था: वे भगवान कृष्ण (बृजराज जी) के परम भक्त थे। नाथद्वारा में अपने प्रवास के दौरान वे श्रीनाथ जी की भक्ति में लीन रहे, जिसका प्रभाव कोटा की तत्कालीन कला पर भी पड़ा।
4. राजदरबार और लेखक (Court & Writers)
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उनके दरबार में ऐसे कवि और लेखक थे जिन्होंने महाराव की स्वाभिमानी छवि और उनके संघर्षों को अपनी रचनाओं में स्थान दिया।
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हाड़ा सरदारों के बीच उनकी लोकप्रियता बनी रही क्योंकि वे उन्हें ‘वंशानुगत शासक’ के रूप में देखते थे।
5. ऐतिहासिक स्रोत (Sources)
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कर्नल जेम्स टॉड: टॉड ने इस पूरे विवाद और मांगरोल के युद्ध का आँखों देखा विवरण अपनी पुस्तक में दिया है। वे इस युद्ध के समय स्वयं वहां मौजूद थे।
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वंश भास्कर: सूर्यमल मिश्रण ने ‘हाड़ा’ और ‘झाला’ के इस आपसी टकराव का बहुत ही सूक्ष्म और ऐतिहासिक वर्णन किया है।
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गौरीशंकर हीराचंद ओझा: अपनी पुस्तक में ओझा जी ने किशोरसिंह द्वितीय के स्वाभिमान और उनकी राजनीतिक विवशता पर विस्तार से लिखा है।
महाराव किशोरसिंह II – मुख्य तथ्य (Table)
| श्रेणी | विवरण |
| मुख्य प्रतिद्वंद्वी | झाला जालिम सिंह (प्रधानमंत्री)। |
| ऐतिहासिक युद्ध | मांगरोल का युद्ध (1821)। |
| राजनीतिक स्थिति | अंग्रेजों की ‘पूरक धारा’ के कारण सत्ता से वंचित रहे। |
| स्वभाव | स्वाभिमानी और धार्मिक प्रवृत्ति के शासक। |
निष्कर्ष:
महाराव किशोरसिंह द्वितीय का जीवन एक त्रासद नायक (Tragic Hero) की तरह था। उन्होंने अपनी खोई हुई शक्ति को पाने के लिए तलवार उठाई, लेकिन अपनों और अंग्रेजों की संयुक्त शक्ति के आगे उन्हें झुकना पड़ा। उनके बाद उनके भाई रामसिंह द्वितीय गद्दी पर बैठे, जिनके समय में 1857 की महान क्रांति हुई।