महाराव रामसिंह द्वितीय (शासनकाल: 1828–1866 ई.) कोटा के हाड़ा चौहान वंश के 11वें शासक थे। उनका शासनकाल राजस्थान के इतिहास में सबसे अधिक चर्चा में रहता है, क्योंकि उनके समय में ही 1857 की महान क्रांति हुई थी, जिसमें कोटा विद्रोह का सबसे प्रमुख केंद्र बना।
यहाँ महाराव रामसिंह द्वितीय के बारे में विस्तृत विवरण दिया गया है:
1. 1857 की क्रांति और कोटा का विद्रोह
कोटा में 1857 का विद्रोह राजस्थान का सबसे सुनियोजित और शक्तिशाली जन-विद्रोह था:
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विद्रोह की शुरुआत: 15 अक्टूबर 1857 को लाला जयदयाल और मेहराब खान के नेतृत्व में कोटा की सेना ने विद्रोह कर दिया।
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पॉलिटिकल एजेंट की हत्या: क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों के पॉलिटिकल एजेंट मेजर बर्टन और उनके दो पुत्रों की हत्या कर दी। मेजर बर्टन का सिर काटकर पूरे कोटा शहर में घुमाया गया।
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महाराव की स्थिति: क्रांतिकारियों ने महाराव रामसिंह द्वितीय को उन्हीं के महल (गढ़) में नजरबंद कर दिया। विद्रोही सेना ने महाराव से एक पत्र पर हस्ताक्षर करवाए, जिसमें लिखा था कि मेजर बर्टन की हत्या महाराव के आदेश पर हुई है (हालांकि महाराव ने बाद में इससे इनकार किया)।
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विद्रोह का अंत: लगभग 6 महीने तक कोटा पर क्रांतिकारियों का अधिकार रहा। अंत में मार्च 1858 में जनरल रॉबर्ट्स के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना ने करौली के राजा मदनपाल की सहायता से कोटा को मुक्त कराया।
2. झालावाड़ रियासत का निर्माण (1838 ई.)
रामसिंह द्वितीय के समय में ही कोटा का विभाजन हुआ:
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विवाद: महाराव और झाला परिवार (झाला जालिम सिंह के वंशज मदनसिंह) के बीच सत्ता को लेकर संघर्ष जारी था।
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समाधान: अंग्रेजों ने इस विवाद को सुलझाने के लिए कोटा राज्य का विभाजन कर दिया और 1838 में झालावाड़ नाम की एक नई रियासत बनाई गई। इसके बाद कोटा की प्रशासनिक शक्तियों से झालाओं का दखल पूरी तरह समाप्त हो गया।
3. सजा और सम्मान में कमी
1857 की क्रांति के बाद अंग्रेजों ने महाराव पर विद्रोहियों की सहायता करने का संदेह किया:
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तोपों की सलामी: अंग्रेजों ने सजा के तौर पर महाराव की तोपों की सलामी 17 से घटाकर 13 कर दी। (बाद में उनकी वफादारी साबित होने पर इसे पुनः बढ़ा दिया गया था)।
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जाँच आयोग: लॉर्ड कैनिंग ने उनकी भूमिका की जाँच के लिए एक आयोग भी बिठाया था।
4. कला, शिक्षा और समाज
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चित्रकला: इनके काल में कोटा चित्रकला शैली में ‘धार्मिक जुलूसों’ और ‘दरबारी दृश्यों’ का बहुत अधिक चित्रण हुआ। इनके समय के चित्रों में रामसिंह द्वितीय को अक्सर उनकी विशिष्ट लंबी दाढ़ी और राजसी ठाट-बाट में दिखाया गया है।
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सामाजिक सुधार: उन्होंने कन्या वध और दास प्रथा जैसी कुरीतियों को रोकने के लिए कुछ प्रयास किए।
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शिक्षा: कोटा में आधुनिक शिक्षा की प्रारंभिक नींव इन्हीं के समय में पड़ी।
5. ऐतिहासिक स्रोत (Sources)
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वीर विनोद (कविराज श्यामलदास): इसमें 1857 की क्रांति के दौरान कोटा की स्थिति और महाराव की लाचारी का विस्तृत वर्णन है।
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गौरीशंकर हीराचंद ओझा: ‘कोटा राज्य का इतिहास’ में ओझा जी ने रामसिंह द्वितीय के शासनकाल की राजनीतिक अस्थिरता और झालावाड़ के गठन का प्रमाणिक विवरण दिया है।
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ब्रिटिश आर्काइव्स: 1857 के विद्रोह से संबंधित सैन्य पत्राचार और मेजर बर्टन की हत्या की रिपोर्टें प्रमुख स्रोत हैं।
महाराव रामसिंह II – मुख्य तथ्य (Table)
| श्रेणी | विवरण |
| मुख्य घटना | 1857 की महान क्रांति (कोटा का जन-विद्रोह)। |
| विभाजन | 1838 में झालावाड़ रियासत का कोटा से अलग होना। |
| नजरबंदी | क्रांतिकारियों द्वारा 6 महीने तक अपने ही महल में कैद। |
| सहायक | करौली के महाराजा मदनपाल (जिन्होंने इन्हें मुक्त कराने में अंग्रेजों की मदद की)। |
निष्कर्ष:
महाराव रामसिंह द्वितीय का शासनकाल संघर्षों और विवशताओं से भरा रहा। जहाँ एक ओर उन्हें झालाओं के प्रभाव से मुक्ति मिली, वहीं दूसरी ओर 1857 की क्रांति ने उनकी प्रतिष्ठा को गहरा धक्का पहुँचाया। वे कोटा के उन शासकों में से हैं जिनका इतिहास वीरता से अधिक राजनीतिक उथल-पुथल के लिए याद किया जाता है।