केल्हण चौहान

महाराजा केल्हण (शासनकाल: 1163–1193 ई. लगभग) नाडोल के चौहान वंश के 10वें शासक थे। वे महाराजा आल्हण चौहान के ज्येष्ठ पुत्र और जालौर के संस्थापक कीर्तिपाल (कीतू) के बड़े भाई थे। केल्हण का शासनकाल नाडोल की शक्ति को बनाए रखने और विदेशी आक्रमणकारियों (तुर्कों) के विरुद्ध कड़ा संघर्ष करने के लिए प्रसिद्ध है।

यहाँ महाराजा केल्हण के बारे में विस्तृत विवरण दिया गया है:


1. शासनकाल और विस्तार (Reign & Power)

केल्हण ने अपने पिता आल्हण की विरासत को बहुत ही कुशलता से संभाला:

  • साम्राज्य की स्थिति: उनके समय में नाडोल का राज्य अपनी पूरी भव्यता पर था। उन्होंने सांडेराव, बाली और आसपास के क्षेत्रों पर पूर्ण नियंत्रण रखा।

  • भ्रातृ प्रेम और सहयोग: यद्यपि उनके छोटे भाई कीर्तिपाल ने जालौर में स्वतंत्र राज्य स्थापित किया था, लेकिन दोनों भाइयों के बीच संबंध सौहार्दपूर्ण रहे। केल्हण ने कीर्तिपाल के सैन्य अभियानों में भी सहायता की।

2. विदेशी आक्रमणकारियों (तुर्कों) से संघर्ष

केल्हण के शासनकाल की सबसे बड़ी चुनौती पश्चिम से आने वाले मुस्लिम आक्रमणकारी थे:

  • मुहम्मद गोरी का प्रतिरोध (1178 ई.): जब मुहम्मद गोरी ने गुजरात के चालुक्यों पर आक्रमण करने के लिए राजपूताना का रास्ता चुना, तो केल्हण ने चालुक्य शासक मूलराज द्वितीय की सहायता की। आबू के निकट हुए युद्ध में चौहान और चालुक्य सेना ने मिलकर गोरी को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया।

  • कुतुबुद्दीन ऐबक से संघर्ष: अपने शासन के अंतिम वर्षों में उन्हें ऐबक की विस्तारवादी नीतियों का भी सामना करना पड़ा, जिसमें उन्होंने नाडोल की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए अंत तक संघर्ष किया।


3. धार्मिक और सामाजिक योगदान

केल्हण अपने पिता की तरह ही धार्मिक रूप से उदार और न्यायप्रिय शासक थे:

  • स्वर्ण कलश का दान: उन्होंने नाडोल के सोमेश्वर मंदिर के शिखर पर सोने का कलश चढ़वाया था, जो उनकी धार्मिक आस्था और राज्य की समृद्धि का प्रतीक था।

  • जैन धर्म का संरक्षण: उनके समय के कई शिलालेख जैन मंदिरों (विशेषकर सांडेराव और नाडोल) से प्राप्त हुए हैं, जो दर्शाते हैं कि उन्होंने जैन समुदाय को भूमि और धन का पर्याप्त दान दिया था।

  • अमारि घोषणा का पालन: उन्होंने अपने पिता द्वारा शुरू की गई ‘अमारि’ (विशेष दिनों पर पशु वध निषेध) की नीति को अपने राज्य में सख्ती से लागू रखा।


4. ऐतिहासिक स्रोत (Sources)

  • नाडोल के शिलालेख (1164, 1167, 1176 ई.): केल्हण के समय के अनेक शिलालेख प्राप्त हुए हैं, जो उनके द्वारा दिए गए दान और उनकी विजयों की पुष्टि करते हैं।

  • सुन्धा पर्वत अभिलेख: इसमें केल्हण को एक ऐसे योद्धा के रूप में वर्णित किया गया है जिसने अपनी तलवार के दम पर दक्षिण राजस्थान की रक्षा की।

  • मुँहणोत नैणसी री ख्यात: नैणसी ने केल्हण को एक ‘मर्यादित’ और ‘वीर’ शासक बताया है।


महाराजा केल्हण – मुख्य तथ्य (Table)

श्रेणी विवरण
क्रम नाडोल के 10वें चौहान शासक।
पिता महाराजा आल्हण।
मुख्य युद्ध मुहम्मद गोरी के विरुद्ध (1178) और कुतुबुद्दीन ऐबक से संघर्ष।
धार्मिक विशेषता सोमेश्वर मंदिर का जीर्णोद्धार और स्वर्ण कलश अर्पण।
उत्तराधिकारी जयतसिंह (उनके पुत्र)।

निष्कर्ष:

महाराजा केल्हण ने नाडोल को उस समय टूटने से बचाया जब उत्तर-पश्चिम से तुर्क आक्रमणों की लहरें आ रही थीं। उन्होंने न केवल अपने राज्य की रक्षा की, बल्कि एक बड़े भाई के रूप में चौहानों की अन्य शाखाओं को भी संरक्षण प्रदान किया। उनके बाद उनके पुत्र जयतसिंह गद्दी पर बैठे, जिनके समय में नाडोल पर तुर्कों का दबाव और अधिक बढ़ गया।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *