कीर्तिपाल चौहान, जिन्हें इतिहास और ख्यातों में ‘कीतू’ के नाम से भी जाना जाता है, नाडोल शाखा के सबसे महत्वपूर्ण राजकुमारों में से एक थे। वे महाराजा आल्हण के पुत्र थे। कीर्तिपाल का नाम स्वर्ण अक्षरों में इसलिए दर्ज है क्योंकि उन्होंने ही 1181 ई. में जालौर के सोनगरा चौहान वंश की स्थापना की थी।
मुँहणोत नैणसी ने उनके बारे में प्रसिद्ध कथन कहा है: “कीतू एक प्रतापी राजा”।
1. पारिवारिक पृष्ठभूमि (Family Background)
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वंश: नाडोल के चौहान (सपादलक्ष की शाखा)।
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पिता: महाराजा आल्हण।
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भाई: केल्हण (जो नाडोल की मुख्य गद्दी पर बैठे)।
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पुत्र: समरसिंह (जो उनके बाद जालौर के शासक बने)।
2. जालौर की विजय और स्थापना (Conquest of Jalore)
कीर्तिपाल एक अत्यधिक महत्वाकांक्षी और वीर योद्धा थे। उन्हें अपने पिता के राज्य (नाडोल) में केवल एक जागीर (चाचिवड़ा) मिली थी, लेकिन वे अपना स्वतंत्र राज्य चाहते थे:
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परमारों को पराजित करना: उस समय जालौर (जाबालिपुर) पर मालवा के परमारों का शासन था। कीर्तिपाल ने 1181 ई. (विक्रम संवत 1238) में परमारों को युद्ध में हराकर सुवर्णगिरि (जालौर दुर्ग) पर अधिकार कर लिया।
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सोनगरा शाखा: जालौर का किला ‘स्वर्णगिरि’ या ‘सोनगिरि’ कहलाता था, इसी कारण यहाँ के चौहान ‘सोनगरा चौहान’ कहलाए।
3. सैन्य अभियान और संघर्ष (Wars & Conflicts)
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मेवाड़ पर आक्रमण: जालौर जीतने से पहले कीर्तिपाल ने मेवाड़ के शासक सामंत सिंह को पराजित कर चित्तौड़ पर अल्पकालिक अधिकार कर लिया था (लगभग 1177 ई.)। हालांकि बाद में सामंत सिंह के भाई कुमार सिंह ने उन्हें वहाँ से हटा दिया।
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गुजरात से संबंध: उन्होंने शुरुआत में गुजरात के चालुक्यों की अधीनता में कार्य किया, लेकिन जालौर जीतने के बाद वे एक स्वतंत्र और संप्रभु शासक के रूप में उभरे।
4. धार्मिक और सांस्कृतिक योगदान
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जैन धर्म: कीर्तिपाल ने जालौर में जैन मंदिरों के निर्माण और उनके संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने ‘जालौर के महावीर स्वामी मंदिर’ को दान दिया था।
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ब्राह्मणों को संरक्षण: उन्होंने विद्वानों को ‘शासन’ (कर-मुक्त भूमि) दान में दी।
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शिव भक्त: वे भगवान शिव के उपासक थे, जिसका उल्लेख उनके शिलालेखों में मिलता है।
5. ऐतिहासिक स्रोत (Sources)
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मुँहणोत नैणसी री ख्यात: नैणसी ने कीर्तिपाल को एक महान विजेता और ‘प्रतापी राजा’ की उपाधि दी है।
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सुन्धा पर्वत शिलालेख (1262 ई.): इस शिलालेख में कीर्तिपाल की विजयों और उनके द्वारा जालौर वंश की स्थापना का विस्तृत वर्णन है।
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कान्हड़दे प्रबन्ध: पद्मनाभ द्वारा रचित इस ग्रंथ में भी सोनगरा चौहानों के मूल पुरुष के रूप में कीर्तिपाल का सम्मानपूर्वक उल्लेख है।
कीर्तिपाल (कीतू) – मुख्य तथ्य (Table)
| श्रेणी | विवरण |
| उपनाम | कीतू (Kitu)। |
| मुख्य उपलब्धि | 1181 ई. में जालौर के सोनगरा चौहान वंश की स्थापना। |
| प्रसिद्ध कथन | “कीतू एक प्रतापी राजा” (मुँहणोत नैणसी)। |
| राजधानी | जालौर (जाबालिपुर)। |
| कुलदेवी | आशापुरा माता (जालौर में मोदरा माता के रूप में प्रसिद्ध)। |
निष्कर्ष:
कीर्तिपाल चौहान एक ऐसे दूरदर्शी योद्धा थे जिन्होंने अपनी छोटी सी जागीर से निकलकर राजस्थान के एक अत्यंत महत्वपूर्ण और अभेद्य दुर्ग (जालौर) पर अपना झंडा फहराया। उनके द्वारा स्थापित इसी वंश में आगे चलकर कान्हड़दे चौहान जैसे महान नायक हुए जिन्होंने अलाउद्दीन खिलजी के विरुद्ध वीरतापूर्ण संघर्ष किया।