राव लुम्भा सिरोही के देवड़ा चौहान वंश के संस्थापक और एक अत्यंत साहसी योद्धा थे। उन्होंने 14वीं शताब्दी की शुरुआत में सिरोही क्षेत्र में चौहानों की सत्ता स्थापित की, जो इससे पहले जालौर के सोनगरा चौहानों के अधीन एक जागीर के रूप में विकसित हो रही थी।
राव लुम्भा के बारे में विस्तृत विवरण यहाँ दिया गया है:
1. पारिवारिक पृष्ठभूमि (Family Background)
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वंश: देवड़ा चौहान (जो जालौर के सोनगरा चौहानों की ही एक उप-शाखा है)।
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पिता: जालौर के प्रसिद्ध शासक सामंतसिंह के वंशज और विजयराज (बीजा) के पुत्र।
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संबंध: इनका सीधा संबंध जालौर के कान्हड़देव चौहान के परिवार से था। जब 1311 ई. में जालौर का पतन हुआ, तब लुम्भा ने आबू के पहाड़ों में अपनी शक्ति संगठित की।
2. प्रमुख युद्ध और विजय (Wars & Victories)
लुम्भा की सबसे बड़ी उपलब्धि आबू (Mount Abu) और चंद्रावती पर अधिकार करना था:
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परमारों से संघर्ष: उस समय आबू और चंद्रावती पर परमार वंश (आबू के परमार) का शासन था।
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विजय (1311 ई.): राव लुम्भा ने परमार शासक हूँण (या कुछ स्रोतों के अनुसार प्रतापसिंह) को पराजित किया।
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छल का प्रयोग: स्थानीय लोककथाओं के अनुसार, लुम्भा ने परमारों को एक भोज पर आमंत्रित किया और विश्वासघात से उन पर आक्रमण कर आबू पर अधिकार कर लिया। इसके साथ ही आबू से परमारों का सदियों पुराना शासन समाप्त हो गया।
3. राजधानी और निर्माण (Capital & Construction)
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चंद्रावती: लुम्भा ने चंद्रावती को अपनी पहली राजधानी बनाया। यह उस समय कला और व्यापार का बहुत बड़ा केंद्र था।
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अचलेश्वर महादेव मंदिर: उन्होंने आबू पर्वत पर स्थित अचलेश्वर महादेव मंदिर का जीर्णोद्धार (Repairs) करवाया। 1320 ई. का एक शिलालेख इसी मंदिर से प्राप्त हुआ है, जो उनकी विजयों की पुष्टि करता है।
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बावड़ी और सुरक्षा: उन्होंने पहाड़ी क्षेत्रों में सुरक्षा चौकियाँ बनवाईं ताकि तुर्क आक्रमणकारियों से बचा जा सके।
4. राजदरबार और विद्वान (Court & Literature)
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धार्मिक संरक्षण: लुम्भा ने हिंदू और जैन दोनों धर्मों को संरक्षण दिया। उनके दरबार में ब्राह्मणों और चारणों का सम्मान किया जाता था।
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लेखक और कवि: लुम्भा के समय के समकालीन साहित्य में विशेष रूप से जैन विद्वानों का उल्लेख मिलता है क्योंकि आबू उस समय जैन धर्म का प्रमुख केंद्र था।
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शिलालेख: उनके काल का सबसे महत्वपूर्ण साहित्यिक/ऐतिहासिक स्रोत अचलेश्वर महादेव मंदिर का शिलालेख (1320 ई.) है। इसकी रचना शुभचंद्र नामक विद्वान ने की थी।
5. ऐतिहासिक स्रोत (Sources)
राव लुम्भा के इतिहास को जानने के लिए हम इन पर निर्भर हैं:
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अचलेश्वर शिलालेख (1320 ई.): इसमें लुम्भा को “अर्बुदाचल (आबू) का विजेता” कहा गया है।
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मुहणोत नैणसी री ख्यात: नैणसी ने देवड़ा चौहानों की वंशावली में लुम्भा को प्रथम स्थान दिया है।
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सिरोही राज्य का इतिहास (गौरीशंकर हीराचंद ओझा): ओझा जी ने लुम्भा के शासनकाल और उनकी विजयों का विस्तृत विश्लेषण किया है।
राव लुम्भा – मुख्य तथ्य (Table)
| श्रेणी | विवरण |
| भूमिका | सिरोही/आबू में देवड़ा चौहान वंश के आदिपुरुष। |
| राजधानी | चंद्रावती। |
| मुख्य शत्रु | आबू के परमार। |
| विशेषता | आबू पर्वत को परमारों से छीनकर चौहानों के अधीन लाना। |
| धार्मिक आस्था | भगवान शिव (अचलेश्वर महादेव) के अनन्य भक्त। |
निष्कर्ष:
राव लुम्भा एक ऐसे रणनीतिकार थे जिन्होंने जालौर के पतन के बाद बिखरते हुए चौहानों को एक नया ठिकाना (आबू की पहाड़ियाँ) दिया। उनकी यह सफलता इतनी स्थायी थी कि सिरोही राज्य 1947 तक देवड़ा चौहानों के पास ही रहा।