कर्नल जेम्स टॉड

कर्नल जेम्स टॉड, जिन्हें राजस्थान के इतिहास में “घोड़े वाले बाबा” के नाम से जाना जाता है, एक ऐसे ब्रिटिश अधिकारी थे जिन्होंने अपना पूरा जीवन राजस्थान के गौरवशाली इतिहास को सहेजने में लगा दिया। उनके बिना राजस्थान का इतिहास आज वैसा नहीं होता जैसा हम जानते हैं।


1. जीवन परिचय और भारत आगमन

  • जन्म: 20 मार्च 1782 (इस्लिंगटन, इंग्लैंड)।

  • भारत आगमन: 1799 में वे एक सैन्य अधिकारी (Cavalry Cadet) के रूप में भारत आए।

  • राजस्थान से संबंध: 1818 से 1822 के बीच उन्हें ‘पॉलिटिकल एजेंट’ बनाकर पश्चिमी राजपूत रियासतों (उदयपुर, जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर) में भेजा गया।

2. उन्होंने राजस्थान के लिए क्या-क्या किया?

इतिहास का संकलन (Collection of History):

टॉड जब राजस्थान आए, तो यहाँ का इतिहास केवल भाटों, चारणों की कविताओं और लोक कथाओं में बिखरा हुआ था। टॉड ने:

  • गाँव-गाँव घूमकर पुराने शिलालेख, सिक्के, ताम्रपत्र और वंशावलियाँ इकट्ठी कीं।

  • वे अपने घोड़े पर बैठकर दुर्गम रास्तों पर जाते थे, इसलिए लोगों ने उन्हें “घोड़े वाला बाबा” कहना शुरू कर दिया।

  • उनके गुरु यति ज्ञानचन्द्र ने प्राचीन लिपियों को पढ़ने और जैन ग्रंथों को समझने में उनकी मदद की।

प्रसिद्ध पुस्तक: “Annals and Antiquities of Rajasthan”

यह राजस्थान के इतिहास का सबसे प्रामाणिक और पहला व्यवस्थित ग्रंथ माना जाता है।

  • प्रकाशन: इसका पहला भाग 1829 में और दूसरा 1832 में लंदन से प्रकाशित हुआ।

  • अन्य नाम: इसे “The Central and Western Rajput States of India” भी कहा जाता है।

  • विषय: इसमें राजस्थान की भौगोलिक स्थिति, सामंती व्यवस्था (Feudalism) और मेवाड़, मारवाड़, जैसलमेर आदि रियासतों का विस्तार से वर्णन है।

नामकरण:

आज हम जिस प्रदेश को ‘राजस्थान’ कहते हैं, उसे यह नाम (साथ ही ‘रायथान’ और ‘रजवाड़ा’) देने का श्रेय कर्नल जेम्स टॉड को ही जाता है। इससे पहले इस क्षेत्र को ‘राजपूताना’ कहा जाता था।

3. महत्वपूर्ण तुलनाएँ और खोजें

टॉड ने राजस्थान की तुलना यूरोपीय इतिहास से की ताकि दुनिया इसकी महानता समझ सके:

  • हल्दीघाटी: इसे ‘मेवाड़ की थर्मोपल्ली’ कहा।

  • दिवेर: इसे ‘मेवाड़ का मैराथन’ कहा।

  • गुरु शिखर: माउंट आबू की इस चोटी को उन्होंने ‘संतों का शिखर’ कहा।

  • महारणा प्रताप: उन्हें एक महान योद्धा और स्वतंत्रता प्रेमी के रूप में विश्व पटल पर रखा।

4. उनकी अन्य कृतियाँ

  • Travels in Western India: यह पुस्तक उनकी मृत्यु के बाद (1839) प्रकाशित हुई, जिसमें उन्होंने राजस्थान और गुजरात की अपनी यात्राओं, कला और संस्कृति का वर्णन किया है।


5. राजस्थान से विदाई और अंत

लगातार यात्राओं और राजस्थान की भीषण गर्मी के कारण उनका स्वास्थ्य बिगड़ने लगा। 1822 में उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया और इंग्लैंड लौट गए। 1835 में लंदन में उनका निधन हो गया।

एक रोचक तथ्य: कर्नल टॉड राजस्थान से इतने प्रभावित थे कि जब वे इंग्लैंड जा रहे थे, तो अपने साथ बहुत सारी मूर्तियाँ और शिलालेख ले जा रहे थे। रास्ते में नाव भारी होने लगी, तो उन्होंने ‘मानमोरी का शिलालेख’ (जो उन्हें चित्तौड़ के पास मिला था) समुद्र में फेंक दिया था।

निष्कर्ष:

कर्नल जेम्स टॉड को ‘राजस्थान के इतिहास का पितामह’ (Father of Rajasthan History) कहा जाता है। यदि वे उन धूल खाते अभिलेखों को इकट्ठा न करते, तो महाराणा प्रताप और सांगा जैसी विभूतियों की वीरता की कई गाथाएं समय के साथ लुप्त हो जातीं।

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