मुहणोत नैणसी (1610–1670) को “राजस्थान का अबुल फजल” कहा जाता है। वे न केवल एक कुशल प्रशासक और सेनापति थे, बल्कि राजस्थान के इतिहास को व्यवस्थित रूप से लिखने वाले प्रथम महान इतिहासकार भी थे।
मुंशी देवी प्रसाद ने उन्हें ‘राजस्थान का अबुल फजल’ की उपाधि दी थी।
1. जीवन परिचय
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जन्म: ओसवाल जैन परिवार में, जोधपुर (मारवाड़) में।
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पद: वे जोधपुर के महाराजा जसवंत सिंह प्रथम के दीवान (प्रधानमंत्री) थे।
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प्रशासक व योद्धा: इतिहासकार होने के साथ-साथ उन्होंने मारवाड़ की सेना का नेतृत्व किया और कई युद्धों में विजय प्राप्त की।
2. प्रमुख रचनाएँ (साहित्यिक योगदान)
नैणसी की दो पुस्तकें राजस्थान के इतिहास के लिए ‘आधार स्तंभ’ मानी जाती हैं:
A. मुहणोत नैणसी री ख्यात
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यह राजस्थान की सबसे प्राचीन और विश्वसनीय ‘ख्यात’ (इतिहास वृत्तांत) मानी जाती है।
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विशेषता: इसमें केवल मारवाड़ ही नहीं, बल्कि मेवाड़, गुजरात, काठियावाड़ और बघेलखंड के इतिहास का भी वर्णन है।
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इसमें राजपूतों की 36 शाखाओं का विवरण मिलता है।
B. मारवाड़ रा परगना री विगत
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इस पुस्तक को “राजस्थान का गजेटियर” कहा जाता है।
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सांख्यिकीय विवरण: इसमें मारवाड़ के प्रत्येक परगने (जिले) की जनसंख्या, आय, कृषि उपज और गाँवों की विस्तृत जानकारी दी गई है।
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यह तत्कालीन सामाजिक और आर्थिक इतिहास जानने का सबसे बड़ा स्रोत है।
3. नैणसी की विशेषताएँ
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सत्यता और निष्पक्षता: उन्होंने इतिहास लिखते समय पक्षपात नहीं किया, यहाँ तक कि अपने राजा की कमियों को भी दर्ज करने से नहीं चूके।
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लोक भाषा का प्रयोग: उन्होंने डिंगल और तत्कालीन राजस्थानी भाषा का प्रयोग किया, जिससे यह इतिहास आम लोगों के करीब रहा।
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जनगणना का विवरण: ‘मारवाड़ रा परगना री विगत’ में उन्होंने उस समय की जनगणना के आंकड़े भी दिए, जो उस काल में एक क्रांतिकारी कदम था।
4. दुखद अंत
महाराजा जसवंत सिंह और नैणसी के बीच कुछ गलतफहमियों और गबन के झूठे आरोपों के कारण उन्हें बंदी बना लिया गया। स्वाभिमानी नैणसी को यह अपमान सहन नहीं हुआ और 1670 ई. में जेल में (फुलमरी नामक स्थान पर) उन्होंने अपने भाई सुंदरदास के साथ आत्महत्या कर ली।
ऐतिहासिक महत्व
मुहणोत नैणसी ने उस दौर में इतिहास लिखा जब आधुनिक साधन मौजूद नहीं थे। उन्होंने गाँव-गाँव जाकर आंकड़े और कहानियाँ जुटाईं। इसीलिए कर्नल जेम्स टॉड से भी पहले, राजस्थान के इतिहास को कलमबद्ध करने का वास्तविक श्रेय मुहणोत नैणसी को ही जाता है।