गोरा और बादल राजस्थान के सैन्य इतिहास के वे देदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिनकी वीरता के बिना चित्तौड़गढ़ का पहला साका (1303 ई.) अधूरा है। ये दोनों रिश्ते में चाचा (गोरा) और भतीजा (बादल) थे (कुछ लोक कथाओं में इन्हें भाई भी बताया गया है), जो रानी पद्मिनी के साथ उनके पीहर (सिंहल द्वीप) से चित्तौड़ आए थे।
इनकी वीरता की कहानी आज भी राजस्थान के घर-घर में सुनाई जाती है।
1. दिल्ली अभियान: राजा को मुक्त कराना
जब अलाउद्दीन खिलजी ने छल से रावल रतन सिंह को बंदी बना लिया और शर्त रखी कि राजा को तभी छोड़ा जाएगा जब रानी पद्मिनी उसके खेमे में आएंगी, तब गोरा और बादल ने एक अद्भुत योजना बनाई:
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पालकियों का षड्यंत्र: उन्होंने संदेश भेजा कि रानी अपनी 700 सहेलियों के साथ आ रही हैं। लेकिन उन पालकियों में रानियाँ नहीं, बल्कि सशस्त्र राजपूत योद्धा बैठे थे और पालकी उठाने वाले (कहार) भी सैनिक थे।
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साहसी बचाव: दिल्ली पहुँचकर गोरा और बादल ने अचानक हमला कर दिया। गोरा ने अलाउद्दीन के खेमे में तबाही मचा दी, जबकि बालक बादल ने रावल रतन सिंह को बेड़ियों से मुक्त कराया और सुरक्षित चित्तौड़ की ओर रवाना कर दिया।
2. गोरा का बलिदान
गोरा ने दिल्ली के पास खिलजी की विशाल सेना को तब तक रोके रखा जब तक राजा सुरक्षित दूर नहीं निकल गए।
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युद्ध के दौरान एक समय ऐसा आया जब गोरा का सिर धड़ से अलग हो गया था, लेकिन लोक मान्यताओं के अनुसार, उनका ‘कबंध’ (बिना सिर का शरीर) भी काफी देर तक दुश्मनों से लड़ता रहा।
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उनकी इस वीरता को देखकर स्वयं खिलजी की सेना भी अचंभित रह गई थी।
3. बालक बादल का शौर्य
बादल उस समय मात्र 12 से 15 वर्ष के किशोर थे। राजा को सुरक्षित चित्तौड़ पहुँचाने के बाद, वे वापस युद्ध के मैदान में कूदे।
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जब बादल युद्ध के बाद घायल अवस्था में महल लौटे, तो उनकी वीरता का वर्णन सुनकर रानी पद्मिनी और अन्य वीरांगनाओं की आँखें भर आईं।
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अंततः 1303 के अंतिम युद्ध में बादल ने लड़ते हुए वीरगति प्राप्त की।
4. साहित्य में गोरा-बादल
इनकी वीरता पर कई कवियों ने अपनी कलम चलाई है। कवि हेमराज ने ‘गोरा-बादल री चौपाई’ (1588 ई.) लिखी थी। आधुनिक काल में कवि नरेन्द्र मिश्र की पंक्तियाँ आज भी रोंगटे खड़े कर देती हैं:
“वह नौजवान बादल था, जो बलिदानी बाना बुनता था,
भारत की मिट्टी-मिट्टी से, वह लोहा-लोहा चुनता था!”
और गोरा के लिए:
“हुंकार भरी गोरा ने तब, बोले— ‘अब देर न करना तुम,’
‘मैं मौत से लोहा लेता हूँ, तुम राजा को लेकर चलना तुम’!”
5. आज भी जीवित यादें
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गोरा-बादल के महल: चित्तौड़गढ़ के किले में आज भी ‘गोरा-बादल के महल’ (गुम्बदनुमा संरचनाएं) मौजूद हैं, जो उनके बलिदान की याद दिलाते हैं।
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प्रतीक: राजस्थान में ‘गोरा-बादल’ की जोड़ी को अजेय साहस और स्वामीभक्ति का सबसे बड़ा उदाहरण माना जाता है।
इन दोनों वीरों ने यह सिद्ध कर दिया कि संख्या बल से बड़ा संकल्प बल होता है।