सोमेश्वर चौहान (शासनकाल: 1169–1177 ई.) चौहान वंश के एक अत्यंत महत्वपूर्ण शासक थे, जिन्हें मुख्य रूप से महान सम्राट पृथ्वीराज चौहान तृतीय के पिता के रूप में जाना जाता है। उनका जीवन और शासनकाल कूटनीति और कलात्मक उन्नति के लिए प्रसिद्ध है।
सोमेश्वर चौहान से जुड़ी प्रमुख बातें निम्नलिखित हैं:
1. प्रारंभिक जीवन और ननिहाल (Life in Gujarat)
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सोमेश्वर का जन्म और बचपन उनके ननिहाल गुजरात (चालुक्य राजदरबार) में बीता।
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उनके पिता अर्णोराज का विवाह गुजरात के राजा जयसिंह सिद्धराज की पुत्री कांचन देवी से हुआ था।
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अपने शुरुआती वर्षों में उन्होंने गुजरात के चालुक्य राजा कुमारपाल के साथ कई युद्धों में भाग लिया और अपनी वीरता सिद्ध की।
2. सत्ता प्राप्ति
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विग्रहराज चतुर्थ की मृत्यु के बाद, उनके पुत्र अपरगांगेय और फिर पृथ्वीराज द्वितीय शासक बने।
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1169 ई. में पृथ्वीराज द्वितीय की निःसंतान मृत्यु के बाद, चौहान सामंतों और मंत्रियों ने सोमेश्वर को गुजरात से बुलाकर अजमेर की गद्दी पर बैठाया।
3. कला और स्थापत्य (Art and Architecture)
सोमेश्वर का काल निर्माण और मूर्तिकला की दृष्टि से बहुत समृद्ध था:
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वैद्यनाथ मंदिर (अजमेर): उन्होंने अजमेर में कई मंदिरों का निर्माण करवाया।
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मूर्तिकला: उन्होंने अपने पिता अर्णोराज और स्वयं की मूर्तियाँ बनवाकर राजदरबार में स्थापित कीं, जो उस समय की अनूठी कला थी।
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सिक्के: उन्होंने ‘अश्वारोही’ और ‘नंदी’ के चित्र वाले सिक्के चलाए, जिन पर एक तरफ उनका नाम और दूसरी तरफ भगवान शिव का वाहन उत्कीर्ण था।
4. पारिवारिक संबंध
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पत्नी: उनका विवाह त्रिपुरी (चेदि) के कलचुरी राजा की पुत्री कर्पूरी देवी से हुआ था।
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पुत्र: उनके दो पुत्र थे—पृथ्वीराज चौहान तृतीय और हरिराज चौहान।
5. संघर्ष और मृत्यु
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सोमेश्वर का शासनकाल अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण रहा, लेकिन उनके अंतिम वर्षों में गुजरात के चालुक्य राजा भीमदेव द्वितीय के साथ संघर्ष हुआ।
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1177 ई. में इसी संघर्ष या युद्ध के दौरान उनकी मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु के समय पृथ्वीराज तृतीय केवल 11 वर्ष के थे।
सोमेश्वर चौहान – एक नजर में
| श्रेणी | विवरण |
| पिता | अर्णोराज (आनाजी) |
| माता | कांचन देवी (चालुक्य राजकुमारी) |
| प्रसिद्ध पुत्र | पृथ्वीराज चौहान तृतीय (राय पिथौरा) |
| राजधानी | अजमेर |
| विशेषता | चौहान और चालुक्य वंशों के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी |
सोमेश्वर चौहान ने एक ऐसे समय में राज्य संभाला जब आंतरिक कलह बढ़ सकती थी, लेकिन उन्होंने कुशलता से शासन किया और अपने पुत्र पृथ्वीराज के लिए एक संगठित राज्य छोड़ा, जिसकी सुरक्षा उनकी पत्नी कर्पूरी देवी ने सोमेश्वर की मृत्यु के बाद संरक्षक के रूप में की।