विग्रहराज चतुर्थ (शासनकाल: 1153–1163 ई.), जिन्हें ‘बीसलदेव’ के नाम से भी जाना जाता है, चौहान वंश के सबसे प्रतापी और विद्वान शासक थे। उनके काल को सपादलक्ष और अजमेर के चौहानों का ‘स्वर्ण युग’ (Golden Age) कहा जाता है।
विग्रहराज चतुर्थ की बहुमुखी प्रतिभा और उपलब्धियां निम्नलिखित हैं:
1. साम्राज्य विस्तार और सैन्य विजय
विग्रहराज चतुर्थ एक महान विजेता थे। उन्होंने चौहानों की सीमा को राजस्थान से निकालकर उत्तर भारत तक फैला दिया:
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दिल्ली विजय: वे दिल्ली के तोमर शासकों को पराजित कर दिल्ली जीतने वाले प्रथम चौहान शासक बने।
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गजनी के तुर्कों पर विजय: उन्होंने गजनी के शासक अमीर खुसरो शाह (हमीर) को हराकर उत्तरी भारत को तुर्क आक्रमणों से मुक्त कराया।
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शिवालिक स्तंभ लेख: दिल्ली के फिरोजशाह कोटला में स्थित इस स्तंभ लेख के अनुसार, उन्होंने विन्ध्याचल से लेकर हिमालय तक के क्षेत्र से कर वसूला था।
2. साहित्य और कला (विद्वत्ता)
वे केवल योद्धा नहीं, बल्कि उच्च कोटि के विद्वान और कवियों के आश्रयदाता भी थे:
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‘हरिकेली’ नाटक: विग्रहराज चतुर्थ ने स्वयं संस्कृत में ‘हरिकेली’ नामक नाटक की रचना की। इस नाटक की कुछ पंक्तियाँ आज भी अजमेर के ‘अढ़ाई दिन के झोंपड़े’ की दीवारों पर उत्कीर्ण हैं।
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उपाधि: उनकी विद्वत्ता के कारण उन्हें ‘कवि बांधव’ या ‘कटि बन्धु’ कहा जाता था।
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दरबारी विद्वान: प्रसिद्ध कवि सोमदेव उनके दरबार में थे, जिन्होंने ‘ललित विग्रहराज’ नाटक लिखा।
3. स्थापत्य और निर्माण कार्य
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संस्कृत पाठशाला: उन्होंने अजमेर में एक भव्य संस्कृत पाठशाला का निर्माण करवाया। (बाद में कुतुबुद्दीन ऐबक ने इसे तुड़वाकर ‘अढ़ाई दिन का झोंपड़ा’ मस्जिद में बदल दिया)।
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बीसलपुर बाँध और कस्बा: उन्होंने टोंक जिले में बीसलपुर नामक नगर बसाया और वहाँ ‘बीसलसागर झील/बाँध’ का निर्माण करवाया। आज भी यह राजस्थान की सबसे बड़ी पेयजल परियोजना है।
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गोकर्णेश्वर मंदिर: बीसलपुर में उन्होंने भगवान शिव का प्रसिद्ध मंदिर बनवाया।
4. साहित्यिक साक्ष्य
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नरपति नाल्ह: इन्होंने ‘बीसलदेव रासो’ नामक ग्रंथ लिखा, जिसमें विग्रहराज चतुर्थ और उनकी रानी राजमती की प्रेम गाथा का वर्णन है।
विग्रहराज चतुर्थ – मुख्य बिंदु (Table)
| विशेषता | विवरण |
| मूल नाम | बीसलदेव |
| स्वर्ण काल | चौहानों की सांस्कृतिक और राजनीतिक शक्ति का चरम। |
| प्रमुख विजय | दिल्ली (तोमर), गजनी के तुर्क, और भंडारकों का दमन। |
| प्रमुख रचना | हरिकेली नाटक (संस्कृत)। |
| प्रमुख निर्माण | संस्कृत कंठाभरण पाठशाला, बीसलपुर झील। |
विग्रहराज चतुर्थ ने वह मजबूत नींव तैयार की थी जिस पर आगे चलकर उनके भतीजे पृथ्वीराज चौहान तृतीय ने एक विशाल साम्राज्य खड़ा किया। डॉ. कीलहॉर्न ने उनकी तुलना महान कवि कालिदास और भवभूति से की है।