राव सुरताण

राव सुरताण (शासनकाल: 1572–1610 ई.) सिरोही के देवड़ा चौहान वंश के सबसे पराक्रमी और स्वाभिमानी शासक थे। उन्हें ‘सिरोही का शेर’ कहा जाता है क्योंकि उन्होंने मुगल सम्राट अकबर की विशाल सेना को युद्ध में पराजित किया था। वे मेवाड़ के महाराणा प्रताप के समकालीन थे और उन्हीं की तरह अपनी स्वतंत्रता के लिए कभी समझौता नहीं किया।

यहाँ राव सुरताण के गौरवशाली इतिहास का विस्तृत विवरण है:


1. मुगल सम्राट अकबर से संघर्ष

राव सुरताण के समय मुगल साम्राज्य अपने चरम पर था, लेकिन सुरताण ने अकबर की अधीनता स्वीकार करने से साफ इनकार कर दिया।

  • विवाद का कारण: अकबर ने महाराणा प्रताप के छोटे भाई जगमाल (जो मेवाड़ छोड़कर मुगलों के पास चला गया था) को सिरोही का आधा राज्य देने का वादा किया था।

  • सुरताण का स्टैंड: राव सुरताण ने अपने राज्य के बँटवारे का कड़ा विरोध किया, जिससे मुगलों और सिरोही के बीच भीषण युद्ध की स्थिति बन गई।

2. दत्ताणी का ऐतिहासिक युद्ध (1583 ई.)

यह सिरोही के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण युद्ध है।

  • पक्ष: एक तरफ राव सुरताण की सेना थी और दूसरी तरफ मुगल सेना (जिसका नेतृत्व जगमाल, बीकानेर के राव रायसिंह और मुग़ल सूबेदार कर रहे थे)।

  • परिणाम: राव सुरताण ने अपनी छोटी सी सेना के साथ मुगलों पर ऐसा जबरदस्त हमला किया कि मुगल सेना भाग खड़ी हुई। इस युद्ध में जगमाल मारा गया और राव रायसिंह घायल होकर भाग गया।

  • महत्व: इस विजय ने सिरोही की स्वतंत्रता को सुरक्षित कर दिया और राव सुरताण का नाम पूरे राजपूताना में गूँज उठा।


3. वीरता और उपनाम

  • स्वतंत्रता प्रेमी: राव सुरताण ने लगभग 52 युद्ध लड़े। मुगलों ने कई बार सिरोही को घेरने की कोशिश की, लेकिन सुरताण ने उन्हें हर बार पहाड़ियों में उलझाकर मात दी।

  • उपनाम: कर्नल जेम्स टॉड ने उन्हें “एक अडिग और बहादुर शासक” के रूप में वर्णित किया है।

4. निर्माण और धार्मिक कार्य

  • सारणेश्वर महादेव: वे भगवान शिव के अनन्य भक्त थे। उन्होंने सारणेश्वर महादेव मंदिर की सुरक्षा के लिए विशेष प्रबंध किए और मंदिर परिसर में कई निर्माण करवाए।

  • लोकप्रियता: उनके शासनकाल में सिरोही की तलवारों का निर्माण अपने शिखर पर था। वे स्वयं हथियारों के पारखी थे।

5. साहित्यिक स्रोत (Sources)

  • मुहणोत नैणसी री ख्यात: नैणसी ने उनकी वीरता और दत्ताणी के युद्ध का आँखों देखा जैसा जीवंत वर्णन किया है।

  • कान्हड़दे प्रबंध के वंशज: चूंकि वे उसी वंश से थे, इसलिए चारण कवियों ने उन्हें कान्हाड़देव के समान ‘धर्म रक्षक’ की उपाधि दी।

  • राजस्थानी दोहे: लोक साहित्य में सुरताण पर कई दोहे प्रसिद्ध हैं, जिनमें उनकी तुलना महाराणा प्रताप से की गई है।


राव सुरताण – एक नजर में (Table)

श्रेणी विवरण
भूमिका सिरोही के सबसे प्रतापी और मुगल-विरोधी शासक।
प्रसिद्ध युद्ध दत्ताणी का युद्ध (1583 ई.)।
मुख्य प्रतिद्वंदी मुगल सम्राट अकबर और जगमाल मेवाड़।
विशेषता अकबर की सेना को हराकर अपनी स्वतंत्रता को अंत तक बनाए रखा।

निष्कर्ष:

राव सुरताण राजपूताना के उन चुनिंदा राजाओं में से थे जिन्होंने मुगलों की ‘सुलह-कुल’ की नीति के सामने झुकने के बजाय संघर्ष का रास्ता चुना। उनकी वीरता के कारण ही सिरोही लंबे समय तक एक स्वतंत्र पहचान बनाए रख सका।

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