मारवाड़ (जोधपुर) का इतिहास वीरता, संघर्ष और स्वामीभक्ति की मिसालों से भरा है। यहाँ का मुख्य शासन राठौड़ वंश का रहा है, जो स्वयं को सूर्यवंशी मानते हैं।
मारवाड़ का इतिहास: संक्षिप्त विवरण
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स्थापना: मारवाड़ में राठौड़ वंश की नींव राव सीहा ने 13वीं शताब्दी (1240 ईस्वी) के आसपास पाली के क्षेत्र में रखी थी।
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शक्ति का विस्तार: राव चूड़ा ने मंडोर को अपनी राजधानी बनाया, जबकि राव जोधा ने 1459 ईस्वी में जोधपुर शहर बसाया और मेहरानगढ़ किले का निर्माण करवाया।
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स्वर्ण काल: मालदेव के समय मारवाड़ अपनी शक्ति के चरमोत्कर्ष पर था, उन्हें “52 युद्धों का विजेता” कहा जाता है।
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मुगल संघर्ष व संधि: राव चंद्रसेन ने अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की और ‘मारवाड़ का प्रताप’ कहलाए। बाद में मोटा राजा उदय सिंह ने मुगलों से वैवाहिक संबंध स्थापित किए।
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राठौड़-मुगल संघर्ष: औरंगजेब के समय वीर दुर्गादास राठौड़ ने 30 वर्षों तक संघर्ष कर अजीत सिंह को वापस गद्दी दिलाई।
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विलय: आजादी के समय महाराजा हनुवंत सिंह मारवाड़ के शासक थे और अंततः जोधपुर का विलय राजस्थान संघ में हुआ।
मारवाड़ के राठौड़ शासकों की वंशावली (Timeline Chart)
यहाँ मारवाड़ के प्रमुख शासकों की वर्षवार सूची दी गई है:
| क्रम | शासक का नाम | शासन काल (वर्ष) | मुख्य विशेषता |
| 1 | राव सीहा | 1240 – 1273 | राठौड़ वंश के संस्थापक (आदि पुरुष) |
| 2 | राव अस्थान | 1273 – 1292 | जलालुद्दीन खिलजी के विरुद्ध संघर्ष |
| 3 | राव धूहड़ | 1292 – 1309 | कर्नाटक से ‘चक्रेश्वरी माता’ की मूर्ति लाए |
| 4 | राव चूड़ा | 1384 – 1423 | मंडोर को राजधानी बनाया |
| 5 | राव रणमल | 1427 – 1438 | मेवाड़ की राजनीति में सक्रिय रहे |
| 6 | राव जोधा | 1438 – 1489 | 1459 में जोधपुर बसाया |
| 7 | राव सातल | 1489 – 1492 | ‘गुड़ला’ उत्सव की शुरुआत इनके काल में हुई |
| 8 | राव सूजा | 1492 – 1515 | बीकानेर के राव बीका का आक्रमण हुआ |
| 9 | राव गांगा | 1515 – 1532 | खानवा युद्ध में सांगा की मदद की |
| 10 | राव मालदेव | 1532 – 1562 | हशमत वाला राजा, गिरी-सुमेल का युद्ध |
| 11 | राव चंद्रसेन | 1562 – 1581 | ‘मारवाड़ का प्रताप’, अकबर का विरोध |
| 12 | मोटा राजा उदय सिंह | 1583 – 1595 | मुगलों की अधीनता स्वीकार की |
| 13 | सवाई राजा सूर सिंह | 1595 – 1619 | अकबर और जहाँगीर के विश्वसनीय |
| 14 | महाराजा गज सिंह | 1619 – 1638 | जहाँगीर ने ‘दल थम्मन’ की उपाधि दी |
| 15 | महाराजा जसवंत सिंह I | 1638 – 1678 | शाहजहाँ के सबसे बड़े सेनापति |
| 16 | महाराजा अजीत सिंह | 1679 – 1724 | दुर्गादास की मदद से गद्दी प्राप्त की |
| 17 | महाराजा अभय सिंह | 1724 – 1749 | इनके समय खेजड़ली बलिदान हुआ |
| 18 | महाराजा राम सिंह | 1749 – 1751 | उत्तराधिकार संघर्ष |
| 19 | महाराजा बखत सिंह | 1751 – 1752 | मारवाड़ का महान योद्धा |
| 20 | महाराजा विजय सिंह | 1752 – 1793 | मराठों के साथ संघर्ष |
| 21 | महाराजा मान सिंह | 1803 – 1843 | सन्यासी राजा, अंग्रेजों से संधि (1818) |
| 22 | महाराजा तख्त सिंह | 1843 – 1873 | 1857 की क्रांति के समय शासक |
| 23 | महाराजा जसवंत सिंह II | 1873 – 1895 | स्वामी दयानंद सरस्वती जोधपुर आए |
| 24 | महाराजा सरदार सिंह | 1895 – 1911 | जसवंत थड़ा का निर्माण करवाया |
| 25 | महाराजा सुमेर सिंह | 1911 – 1918 | प्रथम विश्व युद्ध में सहयोग |
| 26 | महाराजा उम्मेद सिंह | 1918 – 1947 | आधुनिक मारवाड़ के निर्माता (उम्मेद पैलेस) |
| 27 | महाराजा हनुवंत सिंह | 1947 – 1952 | भारत संघ में विलय के समय शासक |
नोट: 1581 से 1583 के बीच जोधपुर ‘खालसा’ (मुगल नियंत्रण) रहा था, इसलिए उस समय कोई स्थानीय राजा नहीं था।